Wednesday, April 21, 2021

पृथ्वी दिवस Earth Day

पृथ्वी दिवस पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्थन प्रदर्शित करने के लिए हर 22 अप्रैल को एक वार्षिक कार्यक्रम के रूप में मनाया जाता है । आज, इस बारे में सोचें कि इस दुनिया में बदलाव लाने के लिए आप क्या कर सकते हैं। आखिरकार जो चीजें आप कर सकते हैं वे इतनी छोटी लग सकती हैं, और ऐसा लगता है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है, मेरा विश्वास करो, यह होगा। तो अब से, चलो खुद से वादा करते हैं कि पृथ्वी के प्रति हमारा व्यवहार रोजाना थोड़ा बेहतर होगा और हर दिन पृथ्वी दिवस बनायेगा। हम यह समझेंगे और संवेदनशील संसार के निर्माण में अपनी भागीदारी देंगे ।

Sunday, April 18, 2021

फूलों में परागण

नमस्कार दोस्तों,मैं महेंद्र आज आपको 'परागण'के बारे में विस्तृत से जानकारी देना चाहता हूँ। जिस प्रकार सजीव प्राणियों में अपनी वंश वृद्धि के लिए प्रजनन की आवश्यकता होती है। उसी प्रकार पुष्पों में भी में भी अपनी वंश वृद्धि के लिए प्रजनन की आवश्यकता होती है। ‘परागण’ इसी क्रिया को कहते हैं इसमें पुंकेसर जोकि पुष्प का नर भाग होता है वह स्त्री केसर यानी वर्तिकाग्र कर परागकणों को पहुँचाता है। पराग कणों का पुंकेसर से वर्तिकाग्र तक पहुंचने की प्रक्रिया को ‘परागण’ कहते हैं। परागण दो प्रकार का होता है... स्वपरागण — इसमें किसी पुष्प के परागकण उसी पुष्प के वर्तिकाग्र तक या उसी पौधे के किसी दूसरे पुष्प के वर्तिकाग्र तक पहुंचते हैं। परपरागण — इस क्रिया में किसी पुंकेसर के परागकण उसी जाति के दूसरे पौधे के पुष्प के वर्तिकाग्र तक पहुंचते हैं। परागण (Pollination) वैज्ञानिक अर्थ में, वर्तिकाग्र (stigma), अंडाशय (ovary) अथवा बीजांड (ovule) पर परागकण के पहुँचने की वह क्रिया है जिससे गर्भाधान के पश्चात्‌ फल और बीज बनते हैं। जब तब बिना गर्भाधान अर्थात्‌ अनिषेकजनन (parthenogenesis) से भी फल तथा बीज उत्पन्न होते हैं। खिले फूलों में कभी कभी ही परागकोश वर्तिकाग्र से सटे मिलते हैं। अतएव जिस समय परागकण परिपक्व होकर बाहर आएँ, इन्हें वर्तिकाग्र तक पहुँचाने का कोई न कोई साधन होना चाहिए। वायु और पतिंगे इन साधनों में मुख्य हैं, यद्यपि कभी कभी जल, पक्षी तथा अन्य जंतुओं द्वारा भी परागण होता है। फूलों के अनेक भेद, इनके विविध रूप, रस, गंध इत्यादि, इन्हीं साधनों के अनुरूप होते हैं। परागण के दो मुख्य भेद हैं : एक तो स्वपरागण (selfpollination), जिसमें किसी फूल में परागण उसी के पराग द्वारा होता है, और दूसरा परपरागण (cross pollination) अर्थात्‌ जब परागण उसी पौधे के दो फूलों, या उसी जाति के दो पौधों, के बीच होता है। जब तब संकरण (hybridisation) भी संभव है और यह दो विभिन्न जातियों के पौधों में परागण से हो जाता है। कुछ साइकैडों (cycades) और ऑर्किडों (orchids) में तो कभी कभी दो वंशों (genera) में भी संकरण हो जाता है। स्वपैरागण केवल उभयलिंगी फूलों में ही संभव है, एकलिंगी फूलों में केवल परपरागण ही हो सकता है। बहुधा आचार्यों का मत है कि परपरागण विशेष हितकर है, यद्यपि कुछ पौधों में केवल स्वपरागण ही होता है। परपरागण के साधनों में वायु, जंतु और जल उल्लेखनीय हैं। इन साधनों से परागित होनेवाले फूलों को क्रमश: वायुपरागित (Anemophilous or wind pollinated), प्राणिपरागित (Zoophilous) और जलपरागित (Hydrophilous) कहते हैं। परागण करनेवाले जंतुओं में पतिंगे मुख्य हैं ओर ऐसे फूल को जो पतिंगों से परागित होते हैं, कीटपरागित (Entomophilous) कहते हैं। वायुपरागण - वायुपरागित फूल बहुधा अत्यंत छोटे, मौलिक तथा अनाकर्षक होते हैं। इनमें भड़कीले रंग, गंध तथा मधु का अभाव रहता है। इनके पुष्पक्रम प्राय: शूकी, या मंजरी और परागकोश बड़े एवं मध्यडोली होते हैं तथा एक ही साथ पकते हैं। पराग अधिक मात्रा में बनता है तथा हलका, शुष्क एवं चिकना होता है और वायु में सुगमता से फैल जाता है। वार्तिकाग्र बड़े, प्रशारिक्त एवं पिच्छाकार होते हैं, अतएव वायु में फैला पराग स्वत: आ फँसता है। बहुधा वायुपरागित वृक्षों में पतझड़ के पश्चात्‌ कोंपल आने के पूर्व ही फूल निकल आते हैं। अत: पत्तियों के अभाव में, परागण होने में कोई रुकावट नहीं पड़ती। वायुपरागित फूल ग्रामिनी (Graminae), अर्थात्‌ घास, बाँस, गन्ना आदि एवं पामी (Palmae), अर्थात्‌ ताड़, खजूर, नारियल आदि, में होते हैं। कीटपरागण - परागण करनेवाले पतिंगों में भौंरे, तितली, शलभ और मधुमक्खी मुख्य हैं (चित्र 1. तथा 2.) यद्यपि कभी कभी चींटियाँ, गोबरेले (bugs) तथा मक्खी आदि भी फूलों पर जाते हैं और उनमें परागण करते हैं।मधुमक्खी और तितली द्वारा परागण दिन में खिलनेवाले फूलों में होता है। और शलभों द्वारा सूर्यास्त के पश्चात्‌ खिलनेवालों में। कीटपरागित फूलों में पतिंगों को आकर्षित करने के विशेष आयोजन होते हैं जिनसे ये अन्य फूलों से सरलतापूर्वक पहचाने जाते हैं। बहुधा ये बड़े तथा आकर्षक होते हैं और दूर से ही स्पष्ट दिखाई दे जाते हैं। यदि फूल छोटे हुए तो प्राय: इनके पुष्पक्रम बड़े तथा लुभावने होते हैं और इस विशेषता से भी ये लनायास ही दृष्टि में पड़ जाते हैं। फूलों की पंखुड़ियाँ रंगदार और भड़कीली होती हैं तथा इनमें मधुग्रंथियाँ भी होती हैं। मधुग्रंथियाँ बहुधा दल अथवा पुंकेसर के आधार पर निर्मित होती हैं और इनसे मधु रसता रहता है, जिसके लोभ से पतिंगे फूलों पर आते और उनमें परागण करते हैं। फूलों की गंध भी पतिंगों को आकर्षित करती है। अँधेरी रात में गंध ही पथप्रदर्शक होकर इन्हें फूलों पर खींच लाती है। किसी किसी फूल की गंध विसैंधी तथा घिनौनी होती है। यह विशेष प्रकृति के पतिंगों को ही आकर्षित करती है। कुछ कीटपरागित फूलों में पराग अधिक बनता है। इस मधुर पराग को पतिंगे बड़े चाव से खाते हैं। इसी के लोभ से वे इनपर मँडराते रहते हैं और परागण करते हैं। कीटपरागित फूलों के पराग लसलसे या खुरदरे होते हैं, जिससे ये पतिंगे के अंग में सहज ही फँस जाते हैं। इनके वर्तिकाग्र चिपचिपे या खुरदरे होते हैं, जिसे पतिंगे के अंग में लिपटा पराग रगड़ खाते ही पुछ जाता है। पतिंगों के अतिरिक्त कुछ अन्य जंतु भी परागण करते हैं। ऐसे फूल प्राय: बड़े होते हैं, और इनमें पराग अधिक मात्रा में बनता है। अनेक चिड़ियाँ, चमगादड़, इत्यादि भोजन की खोज में फूलों पर मँडराते रहते हैं और इनमें परागण करते हैं। इन जंतुओं में पखी विशेष विचार करने योग्य हैं। जंतु परागित फूलों की संख्या अधिक नहीं है। कुछ ऐसे पौधे दक्षिणी गोलार्ध में मिलते हैं। नियमित रूप से परागण करनेवाले पक्षियों में नई दुनिया का हमिंग पक्षी (humming bird) और पुरानी का शकरखोरा (sun bird) और मधुचूषक (honey sucker) हैं। ये अत्यंत सुंदर, लाल (पक्षी) अथवा बया (weaver bird) सदृश छोटी छोटी पतली चोंच तथा सुहावने रंगवाले पक्षी होते हैं। जब तब कुछ बड़ी जाति के पक्षी भी परागण करते हैं। पक्षीपरागित फूलों में अफ्रीका का मार्कग्रेविया अंबूलेटा (Marcgravia umbulata) उल्लेखनीय है। पक्षीपरागित फूल कीटपरागित फूलों के सदृश ही होते हैं एवं इनपर पतिंगे भी आते जाते और परागण करते हैं। बहुधा ये लाल, नारंगी अथवा बेमेल रंग के, जैसे नारंगी हरे वा नारंगी-नीले, होते हैं तथा इनमें मीठा, तरल रस प्रचुर मात्रा में भरा रहता है। इनके पुमंग बहुकेसरी एवं कूर्ची जैसे तथा वर्तिकाग्र बाहर को निकले होते हैं। इन फूलों के संबंध में निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि इनपर पक्षी मधु के लिए आते हैं अथवा इनपर आनेवाले मधुलोलुप पतिंगों के लिए। जलपरागण - कुद इने गिने जलमग्न पौधों में ही जलपरागण होता है। ऐसे पौधों के पराग का घनत्व पानी के घनत्व के बराबर ही होता है और ये पानी की सतह के नीचे बहते रहते हैं। रपिया (Ruppia), ज़ॉस्टीरा (Zostera) ओर वैलिसनेरिया (Vallisneria) ऐसे ही पौधों में हैं। परागण अनुकूल अवस्थाएँ तथा प्रतियुक्तियाँ - प्राय: पौधों में ऐसी आयोजनाएँ रहती हैं जिनसे न केवल परपरागण ही सुगम हो जाता है वरन्‌ स्वपरागण की संभावना भी नहीं रह जाती (देखें चित्र 2.)। इनमें निम्नलिखित विशेष उल्लेखनीय हैं : 1. एकलिंगी अवस्था - इस दशा में या तो नर और नारी फूल एक ही पौधे पर होते हैं, जैसे कद्दू, लौकी आदि में, अथवा अलग अलग पौधों पर, जैसे पपीते, शहतूत आदि में। अत: इस रूप में केवल परपरागण ही संभव है। 2. स्वबंध्यता (Self Sterility) - कुछ पौधों में किसी फूल के पराग केवल उसी के लिए अग्रहणीय होते हैं, जिससे स्वपरागण उभयलिंगी अवस्था में भी सफल नहीं हो सकता। कुछ आर्किडों में तो यह प्रकृति इतनी प्रबल होती है कि यदि स्वपरागण हो जाए तो विषैला असर फैल जाता है और बिना गर्भाधान के फूल यों ही मुर्झा जाते हैं। 3. भिन्नकालपक्वता (Dichogamy) - यह वह अवस्था है, जिसमें किसी उभयलिंगी फूल के पुंकेसर एवं वर्तिकाग्र आगे पीछे परिपक्व होते हैं। भिन्नकालपक्वता के निम्नलिखित दो रूप हैं : (अ) पंपूर्वता (Protandry), जिसमें पुंकेसर, वर्तिकाग्र की परिपक्व अवस्था आने के पूर्व ही पककर और अपने पराग बिखराकर, मुर्झा जाते हैं, और इसके विपरीत (ब) स्त्रीपूर्वता (Protogyny), जिसमें वर्तिकाग्र, पराग परिपक्व होने के प्रथम ही पूर्ण विकास को प्राप्त हो, पराग ग्रहण कर मुर्झा जाता है। प्रथम श्रेणी के फूलों को पुंपूर्व (protandrou) तथा दूसरी श्रेणीवालों को स्त्रीपूर्व (protygynous) कहते हैं। पहली विशेषता के फूल कंपोज़िटी (Compositae), अर्थात्‌ सूर्यमुखी आदि में, और दूसरी के सरसों एवं ऐरिस्टोलोकिया (Aristolochea) आदि में होते हैं। 4. विषम वर्तिकात्व (Heterostyly) - यह वह अवस्था है जब वर्तिका और पुंकेसर एक दूसरे के अनुपात में लंबे अथवा छोटे होते हैं। ऐसे फूल द्विरूपी (ड्डत््थ्रदृद्धद्रण्दृद्वद्म) होते हैं और ये दो प्रकार के होते हैं : प्रथम वे जिनकी वर्तिका लंबी और पुंकेसर छोटे होते हैं और दूरे वे जिनमें, इसके विपरित, छोटी वर्तिका और लंबे पुंकेसर होते हैं दोनों प्रकार के फूल अलग अलग पौधों पर होते हैं। इन अंगों की अवस्था ऐसी होती है कि परागण केवल उन्हीं फूलों के बीच हो पाता है जिनमें वर्तिका और पुंकेसर अंग समान लंबाई के हों, अर्थात्‌ लंबी वर्तिका और पुंकेसर अंग समान लंबाई के हों, अर्थात्‌ लंबी वर्तिका और लंबे पुंकेसरवाले फूलों के मध्य, अथवा छोटे पुंकेसर और छोटी वर्तिकावाले फूलों में। विषम वर्तिकावाले फूल अलसी (Linum) और प्रिमुला (Primula) में होते हैं। खट्टी बूटी अर्थात्‌ ऑक्ज़ैलिस (Oxalis) में फूल त्रिरूपधारी होते हैं। इसमें लंबी, मँझोली और छोटी तीनों वर्तिकावाले फूल होते हैं। परपरागण और स्वपरागण से हानि और लाभ - तुलना तथा प्रयोगों से सिद्ध हो चुका है कि स्वपरागण की अपेक्षा परपरागण विशेष हितकर होता है। परपरागण द्वारा उपार्जित बीज प्राय: स्वपरागण से उत्पन्न बीजों की अपेक्षा भारी, बड़े तथा प्रौढ़ होते हैं। इनमें अंकुरणसामर्थ्य भी अधिक होता है एवं इनसे उत्पन्न पौधे पुष्ट और अधिक स्वस्थ होते हैं। अत: किसी वंश को बलहीन होने तथा अवनति से बचाने के लिए परपरागण अवश्यक है। किसी किसी अवस्था में स्वपरागण भी उपयोगी होता है। इस क्रिया के लिए पौधे बाहरी साधनों पर आश्रित नहीं होते। अतएव आर्थिक विचार से पौधे के लिए यह लाभदायक है। जिन फूलों में परागकोश और वर्तिकाग्र साथ साथ पक जाते हैं, उनमें स्वपरागण सूगम हो जाता है। परपरागण का सर्वोत्तम आयोजन रहता है, परंतु इनमें ऐसी भी व्यवस्था रहती है कि यदि यह क्रिया असफल रहे तो स्वपरागण भी सुगम हो जाता है, जिससे बीज अवश्य ही बन जाते हैं। अनुन्मील्य परागण (Cleistogamy) और अनुन्मील्य परागणी (Cleistogamous) पुष्प - कुछ पौधों में साधारण फूलों के अतिरिक्त कुछ अत्यंत छोटे, गंध-रस-हीन, कली जैसे अस्पष्ट फूल भी उत्पन्न होते हैं। ऐसे फूल परपरागण के प्रतिकूल ऋतुकाल में ही बनते हैं और यद्यपि ये अस्पष्टदली एवं अविकसित ही होते हैं, फिर भी इनमें बीज उत्पन्न हो जो हैं। इनके परागकोश और वर्तिकाग्र प्राय: सटे रहते हैं, जिससे परागरज वर्तिकाग्र पर सरलतापूर्वक पहुँच जाता है। प्राय: ऐसे फूलों में परागकण परागकोश के भीतर ही अंकुरित हो जाते हैं और वहीं से परागनली में बढ़कर बीजांड में प्रवेश करते हैं। अनुन्मील्य परागणी पुष्पों की उत्पत्ति प्राय: पौधों के जमीन के भीतरवाले तने पर बहुधा अनुकूल ऋतु के अंत में, अथवा अतिशय शीत एवं अंधकार में ही होती है। कनकौआ (Commelina), खट्टी बूटी और बनफशा (Viola) में ऐसे ही फूल होते हैं। बहुधा लोगों का अनूमान है कि जब तब भूमि के अंदर उत्पन्न होनेवाले कटहल भी इसी ढंग से परागित फूलों के परिणाम हैं। परागण करनेवाले पतिंगों के अनुसार फूलों के निम्नलिखित भेद हैं : 1. पराग (Pollen) पुष्प - इस समूह के फूलों में पराग अधिक बनता है ओर इसी के लिए पतिंगे फूलों पर आते हैं। युका (Yucca), पोस्ता और अमलतास में परागपुष्प होते हैं। 2. वे फूल, जिनमें मधुरक्षा का यथार्थ साधन नहीं होता - ऐसे फूलों में मधु पूर्ण रूप से खुला रहता है। गैलियम (Gallium), आइवी (lvy), सौंफ और धनिया आदि में ऐसे ही फूल होते हैं। 3. वे फूल, जिनमें मधु न्यूनाधिक सुरक्षित रहता है - ऐसे फूल रेनन कुलेसिई (Ranunculaceae), अर्थात्‌ जलकांडर कुल तथा मर्टेसिई (Myrtaceae), अर्थात्‌ लवंगादि कुल, में होते हैं। इनमें मधुकोश उन्हीं पतिंगों की पहुँच में होता है जिनकी सूँड़ कम से कम 3 मिमी. लंबी हो। 4. वे फूल जिनमें मधु पूर्णत: सुरक्षित तथा गुप्त रहता है - इस श्रेणी के फूलों में मधु तक केवल वे ही पतिंगे पहुँच पाते हैं और परागण में सफल होते हैं जिनकी सूँड़ छह मिमी. तक लंबी हो। सोलेनेसिई (Solanaceae) अर्थात्‌ कंटकारी कुल और स्क्रॉफुलेरिया (Scrophuleria) में ऐसे फूल होते हैं। 5. लंबी नलीवाले फूल - ये फूल मधुमक्खी, शलभ तथा तितली के अनुरूप होते हैं और इनकी दलनली 2 मिमी. से 30 मिमी. तक लंबी होती है। जिन फूलों का परागण तितली द्वारा होता है, वे बहुधा भड़कीले लाल रंग के होते हैं और जिनमें शलभ द्वारा होता है, वे अधिकांश हलके पीले या सफेद। शलभ परागित फूल प्राय: गोधूलि के पश्चात्‌ खिलते हैं और इनमें तेज गंध होती है। जुही, चमेली, कामनी मनोकामनी, रजनीगंधा आदि ऐसे ही फूलों में हैं। ऐमरलिडेसिई (Amaryllidaceae), अर्थात्‌ सुदर्शन कुल, आइरिडेसिई (Iridaceae) अर्थात्‌ नरगिस कुल तथा ऑर्किड में भी परागण इन्हीं पतिंगों द्वारा होता है। 6. मधुमक्खी फूल (Bee Flowers) - इस समूह के फूल प्राय: एक व्यास सममित (Zygomorphic) तथा लाल, नीले या बैंगनी होते हैं। पैपिलियोनेसिई (Papilionceae), अर्थात्‌ अगस्त कुल, लैबीऐटी (Labiatae), अर्थात्‌ तुलसी कुल, में ऐसे फूल होते हैं। 7. बर्रे (ज़्aद्मद्र) पुष्प - ये फूल मधुमक्खी फूल सरीखे होते हैं, परंतु इनका रंग भूरा या हलका लाल होता है। 8. शलभ और तितली फूल (Moth and Butterfly Flowers) - इस समूह के फूलों की दलनली प्राय: 12 मिमी. से अधिक लंबी होती है और इनमें मधु शहद की मक्खियों की पहुँच के बाहर होता है। लोनीसीरा (Lonicera), तंबाकू (Nicotiana), चौधारा (Orcus), हवलदिल चाँदनी (Convolvulus purpurea) इत्यादि में परागण यहीं पतिंगे करते हैं। 9. धिनौना (Carrion Flowers) - इन फूलों में बिसाँर्यध और दुर्गंध आती है तथा इनपर असायी या अन्य सड़े गले मांस, मल और गलीज पर आनेवाली मक्खियाँ आती हैं तथा इनमें परागण करती हैं। अरिस्टोलोकिया (Aristolochia) और स्टैपीलिया (Stapellia, यह आक समूह का पौधा है) तथा अरबी, सूरन आदि में इन्हीं मक्खियों द्वारा परागण होता है। इस समूह के कुछ पौधों में, जैसे अरिस्टोलोकिया में, मक्खियों के फँसाने का प्रतिबंध भी रहता है। उत्तेजना और परागण - किसी किसी फूल के पुंकेसर अथवा वर्तिकाग्र उत्तेजनाशील होते हैं, जिससे परागण सुगम हो जाता है। बिछुआ (Urtica), मिमूलस (Mimulus), टोरीनिया (Torenea) और बिग्नोनिया वेनस्टा (Bignonia venusta) के वर्तिकाग्र द्विशाखित होते हैं और इनका भीतरी पृष्ठ रगड़ से चंचल हो जाता है। यदि इस क्रिया में वर्तिकाग्र पर पराग न पहुँच पाया और पतिंता यों ही आकर चला गया अथवा वर्तिकाग्र की शाखाएँ फिर खुल जाती हैं; परंतु यदि परागकण आ गए हों और परागण हो गया हो तो भुजाएँ सदैव के लिए बंद हो जाती हैं। जिन फूलों के पुंकेसर स्पर्श से चंचल हो उठते हैं उनके परागकण झरकर सुगमता से पतिंगे के अंग में लग जाते हैं, जिससे परपरागण में सुविधा हो जाती है। नागफनी (Opuntia) और सेंटॉरिया (Centaurea) ऐसे ही पौधे हैं। विस्फोटक क्रियाविधियाँ (Explosive Mechanisms) - कुछ फूलों में परागकोश का स्फोटन विशेष ढंग से होता है और पराग उड़कर कुछ दूर तक बिखर जाते हैं, जिससे परपरागण सुगम हो जाता है। अर्टिका तथा इस समूह के कुछ अन्य पौधों में जिस समय परागकोश चिटकते हैं परागकण दूर तक फैल जाते हैं। कुछ पौधों में ये विशेष ढंग से उड़कर पतिंगों के अंग पर जा गिरते हैं। कुछ ऐसे पौधों में परागकोश मध्यडोली होते हैं और ऐसे ढंग से लगे रहते हैं कि मधु को खोजता हुआ पतिंगा ज्योंही इनसे एक ओर टकराता है, परागकोश का दूसरा सिरा झुककर पतिंगे की पीठ पर ऐसे आ लगता है कि परागकण बिखर कर पतिंगे की पीठ पर फैल जाते हैं सैल्विया (Salvia) ऐसे फूलों का उत्तम उदाहरण है। लूट, चोरी - प्राय: फूलों में मधु सरक्षित ढंग से संचित रहता है और विशेष प्रकार के पतिंगे ही यहाँ तक पहुँच सकते हैं, फिर भी कितने ही फूलों में इसे कुछ चतुर पतिंगे तथा चिड़ियाँ जब तब यों ही चाट जाती हैं। इन लुटेरों में मधुमक्खियाँ तथा चिड़ियाँ मुख्य हैं। ये मधु को सुरक्षित रखनेवाले यंत्र के नीचे, पुंकेसर और वर्तिकाग्र का बचाकर, फूल में छेदकर उसी छेद की राह मधु चूस लेती हैं। जब एक बार यह मार्ग खुल जाता है तब बाद में आनेवाले सभी जीव स्वाभाविक परंतु अड़चनवाले मार्ग को, जिससे आने में परागण की संभावना रहती है, त्याग देते हैं और इसी कृत्रिम राह से आते जाते हैं, जिससे परागण नहीं हो पाता। पराग को नमी से बचाने के साधन - नमी पहुँचने पर प्राय: पराग अंकुरित होने लगता है। अस्तु, फूलों में इसे पानी एवं तरी से बचाने के कुछ विशेष साधन रहते हैं। कुछ पौधों के पराग में विशेष प्रकार के रोम अथवा अन्य रचनाएँ रहती हैं, जिनसे इन पर जल का विशेष असर नहीं होता। कुछ पौधों में फूल ऐसे ढंग से लटके रहते हैं कि इनके पुंकेसर भीगने से बचे रहते हैं। ऐसे फूल लिलिएसिई (Liliaceae) कुल के कुछ पौधों में होते हैं। कुछ फूल रात को और प्रतिकूल वातावरण में बंद हो जाते हैं। इस प्रकार पराग नमी से बचा रहता है। ऐसी विशेषतावाले फूल केसर तथा ट्यूलिप (Tulip) में होते हैं। परपरागण के कुछ अपूर्व उदाहरण - युका लिलिएसिई कुल का मरुस्थलीय परागपुष्प पौधा है। इसका पुष्पक्रम बड़ा मनोहर एवं फूल उभयलिंगी, अंडाकार, लोल तथा आकर्षक होते हैं। इसके परागकोश बड़े होते हैं और पराग अधिक मात्रा में बनता है। इसमें परागण प्रोन्यूबा (Pronuba) शलभ द्वारा होता है। प्रोन्याना युका के किसी पुष्प से पराग संचित कर उसकी गोली सी बना लेता है, फिर किसी दूसरे फूल के वर्तिकाग्र पर चढ़ उसके मध्य सावधानी से ठूस देता है। इस भाँति इस पौधे में परागण हो जाता है। अब पतिंगा वर्तिका की राह नीचे खिसक उसी फूल की गर्भाशयभित्तिका को छेदकर अपने अंडे रखता है। समय पर युका में बीज और शलभ के अंडों से डिंभ (larva) तैयार होते हैं। डिंभ युका के मृदुल बीज खाकर पलते हैं, परंतु फिर भी बीज पर्याप्त मात्रा में बच रहते हैं। इस पतिंगे ओर युका का ऐसा घनिष्ठ संबंध है कि प्राय: जिस स्थान पर युका नहीं होता, प्रोन्यूबा नहीं मिलता और जहाँ प्रोन्यूबा नहीं मिलता वहाँ युका नहीं पनपता। इन दोनों का भौगोलिक वितरण एक ही है। अंजीर (fig), मोरेसिई (Moraceae) अर्थात्‌ वट, पीपल आदि के कुल का पौधा है। इसका पुष्पक्रम सेब या नाशपाती जैसा होता है। बाजार में बिकता अंजीर पके पुष्पक्रम से ही बनता है। ऐसे पुष्पक्रम को हाइपेंथोडियम (Hypanthodium) कहते हैं। हाइपैथोडियम के शिखर पर एक महीन छेद तथा नन्हें नन्हें शल्क होते हैं, जो छेद के अंदर भी भरे रहते हैं। अंजीर में नर और नारी पुष्प एक ही पुष्पक्रम में होते हैं। नर पुष्प छेद के नीचे शिखर के समीप होते हैं। नारी पुष्प, लंबी या छोटी वर्तिकावाले, दो भाँति के होते हैं। पहले प्रकार के फूल फलद (fertile) तथा दूसरे बंध्या होते हैं। अंजीर का पुष्पक्रम आद्यबीजांड विकसित है ओर इसमें परागण एक विशिष्ट बर्रे ब्लैस्टोफेना (Blastophaga) द्वारा होता है। मादा बर्रै अंजीर पकने के पूर्व ही शिखर के छेद से दाखिल होती है और, अंडे रखने के अभिप्राय से, यह पुष्पक्रम के भीतर घूमती फिरती है। यहाँ आने के पहले यह बर्रै अन्य पुष्पव्यूह से होकर आई होती है और इसके अंग पर पराकण लगे रहते हैं। अस्तु, ये बड़ी वर्तिकावाले फूलों के वर्तिकाग्र से पुँछ जाते हैं और इन फूलों में परागण हो जाता है। अंत में बर्रै छोटी वर्तिकावाले फूलों के गर्भाशय में अंडे रख देती है। समय पर इन अंडों से बच्चे उत्पन्न हाते हैं ओर य इन फूलों की वर्तिका में संचित पदार्थ खाकर उनसे बाहर आते हैं अब तक अंजीर के पुंमंग भी पक जो हैं और जिस समय नवजात बर्रै फूलों पर भटकते हैं, इनके अंग पर पके पराग पुँछ आते हैं। अब तक अंजीर भी पक चुकता है और इसकी भित्तिका नरम पड़ जाती है, जिससे ये बर्रै इसमें अंदर से छेदकर बाहर आ जाते हैं। बाजारों के अंजीर में जो छेद प्राय: होते हैं वे इस प्रकार के ही हाते हैं। अंजीर से बाहर होने के पश्चात्‌ मादा बर्रै अन्य कच्चे अंजीर में फिर प्रवेश करती है और वे ही सारी क्रियाएँ फिर होती है। अरिस्टोलोकिया आरोही लता है। इसमें भी आद्यबीजांड विकसित फूल होते हैं। फूल का ऊपर भाग तुरही जैसा होता हैं। और इसके भीतरी पृष्ठ पर पीछे को रुख किए घने आशून रोम होते हैं। फूल से बिसायंध आती है और इसमें परागण सड़े गले मांस पर से आनेवाली मक्खियों द्वारा होता है। फूल के तुरही जैसे भागवाले स्थान पर रोमां की स्थिति ऐसी होती है कि जिस समय फूल खिलते हैं, इनमें मक्खियाँ, जो मधु के लिए आती हैं, केवल अंदर को ही जा सकती हैं बाहर नहीं निकल सकतीं। यह अवस्था लगभग तीन चार दिन तक रहती है। मक्खियाँ प्राय: दूसरे फूलों से होकर आती हैं और उनके अंगों में परागकण लिपटे होते हैं, जिससे जब ये वर्तिकाग्र से रगड़ खाते हैं तो फूल में परागण हो जाता है। बाद में इनके परागकोश पक जाते हैं और इनसे परागकण बाहर होकर फूल में घूमनेवाली मक्खियों के अंग में पुँछ जाते हैं। अंत में फूल मुर्झा जाते हैं, जिससे इनके रोम भी लच जाते हैं और मक्खियाँ आसानी से बाहर आ जाती हैं। अब ये अन्य फूलों में जाती हैं और पुन: उसी प्रकार परागण करती हैं। सैल्विया (Salvia) लेबिएटी (Labiatae), अर्थात्‌ तुलसी कुल का, पौधा है। इसका दलपुंज दलपुंज द्विऔष्ठी (bilabiate) होता है। निचला ओष्ठ उत्कृष्ट और पतिंगों को आकर्षित करना है। यही उनके उतरने का घाट भी है। ऊपरी ओष्ठ नीचे को झुका होता है तथा वर्तिकाग्र और पुंकेसर की रक्षा भी करता है। फूल में केवल दो पुंकेसर होते हैं। इनके पुंतंतु छोटे, परंतु योजी लबे होते हैं। योजी के दोनों सिरों पर अर्थ परागकोश होते हैं। ऊपरी परागकोश फलित, तथा निचला बंध्य और ऊपरवाले की अपेक्षा छोटा और चिपटा, होता है। दोनों योजियों के निचले भाग एक दूसरे से सटे होते हैं और जिस समय पतिंगा मधु की खोज में फूल के अंदर प्रवेश करना चाहता है, इसका सिर अपने आप ही योजियों के निचले भाग को अंदर ढकेलता है, जिससे दोनों ऊपरी परागकोश इसकी पीठ पर आ गिरते हैं। इस धक्के से परागकोश फट जाते हैं और परागकण छितरकर पतिंगे की पीठ पर फैल जाते हैं। जब पतिंगा बाहर आता है तब पुंकेसर फिर अपनी पूर्वावस्था में आ जाते हैं। सैल्विया के फूल पूर्व पराग-विकसित होते हैं ओर जिस समय तक फूल नर अवस्था में रहते हैं, वर्तिका ऊपर को उठा रहती है। इससे जब पतिंगा ऐसे फूलों में घुसता है तब वर्तिकाग्र का इसके अंगों से स्पर्श नहीं होता, परंतु यही फूल जब बाद में नारी अवस्था में पहुँच जाते हैं, इनकी वर्तिका नीचे झुक जाती है और अब ज्योंही पतिंगा फूल के अंदर प्रवेश करने लगता है, वर्तिकाग्र ही उसकी पीठ से रगड़ता है, जिससे इनकी पीठ पर पसरा पराग सरलता से पुँछ आता है और परागण हो जाता है।

◆ गिरगिट का अस्तित्व खतरें में

◆गिरगिट (Chameleon) का अस्तित्व खतरें में ◆ बढ़ते प्रदूषण व व्यापक रूप से जंगलों की कटाई से पर्यावरण पर इसका व्यापक असर पड़ रहा हैं और इसी के कारण मौसम का मिजाज भी जलवायु परिवर्तन में सहायक हो रहा हैं। लगातार परिवर्तन हो रहे मौसम व जलवायु पर पड़ रहा हैं, जिससे इनकी प्रजाति धीरे-धीरे विलुप्त के कगार पर पहुंच गई हैं। विलुप्त होते प्रजातियों में सबसे बड़ा खतरा वर्तमान किसानों को मित्र के रूप में पहचानें जाने वाले विरल प्रजाति का रंग बदलने वाला बड़ा गिरगिट अब अपने अस्तित्व को बचाने संघर्ष कर रहा हैं। सामान्य गिरगिट से बड़ा व गोल से छोटा यह विरल प्रजाति का रंग बदलने वाला गिरगिट, एक समय था कि जब जिले के कोलाबीरा, लैयकरा, किरमिरा ब्लाक में सैकड़ों की संख्या में नजर आते थे। विरल जाति के गिरगिट खेतों व खलिहानों में फसल में लगने वाले कीड़े, कीट को चटकार, खा जाते थे। इनके इसी गुणों के कारण इन्हें किसानों का मित्र भी कहा जाता था मगर अस्वाभाविक रूप से जलवायु परिवर्तन से जैव विविधता संकट में पड़ गई है और इस परिवर्तन मे ताल से ताल मिलाकर नही चल पा रहे अनेक विरल जाति के पक्षी व अन्य जीव जंतुओं का वंश पृथ्वी से तेज गति से विलुप्त होती जा रही हैं। विरल जाति का गिरगिट एक बार में सात रंग बदलता था। इसमें औषधि गुण होने से इसकी विशेषता अन्य गिरगिटों से कहीं अधिक है। इसी कारण इसको पकड़ने व इसकी हत्या करने से भी लोग पीछे नहीं हटते। वही विलुप्त के कगार में पहुंच चुके रंग बदलने वाले औषधि गुण से युक्त उक्त गिरगिट की प्रजाति की सुरक्षा के साथ इनके संरक्षण किए जाने की बात अंचल वासियों द्वारा कही जा रही हैं।

Sunday, April 11, 2021

पशुदूध प्रेमियों से सवाल

*_पशुदूध प्रेमियों से मेरे कुछ सवाल हैं--उनके जवाब भी दिये गये हैं-_--* 👇🏻👇🏻 *1) गाय या भैंस की आयु क्या होती है ? और पुरे जीवन काल में कितने बच्चे देती है ??* जवाब; -- गाय और भैंस जिनका प्राकृतिक आयुष्य 15 से 20 साल होता है पर डेरी उद्योग की अविरत माँग की वजह से वो पूरे जीवन भर एक दूध की मशीन बन कर रह जाती है, दूध आने के लिए वह सभी गायों भैंसों को बच्चों को जन्म देना अनिवार्य है, बच्चो को जन्म देने के लिए सभी गाय भैंस को अपने हाथ से इंसान उसका हर एक साल बलात्कार कर के बच्चों को जन्म देने पर विवश करता है जिस से गाय या भैंस पुरे जीवन भर आप को अविरत दूध दे सके,और पूरे जीवन भर बच्चों को जन्म दे कर, प्रसव पीड़ा भोगने के बाद उनकी आयु 8 से 10 साल हो जाती है| *2) क्या कारण है कि भारत विश्व के TOP 3 बीफ और चमड़ा एक्सपोर्ट करने वाले देशों में से एक है ??* जवाब---हमारे देश में फिलहाल 65% गाय हैं और 35% बैल/सांड & भैसों की संख्या देखें तो 15% नर और 85% मादा और देश में 55% दूध भैसों से आता है-- सीधा सा समझिये कि अधिकतम नर बच्चे सीधे बंद ट्रक में लाद कर कर बंद दीवारों के भीतर काट दिए जाते है क्यों की वह बच्चे कुछ फायदा नहीं कराने वाले हैं उनको मरना पड़ता है (और कई सडको पर आवारा छोड दिया जाता है,,कचरा खाने के लिये और विकृत मौत मरने के लिये)आप स्वयं विचार करें कि इतना ज्यादा असंतुलन क्यूँ !! क्यूँकि ये सब होता है आप के दूध, मांस, चमड़े, और कॉस्मेटिक और दवाईओ आदि सभी पशुपदार्थों के उपयोग की लालच के लिये :: *3) पूरी धरती पर ऐसा कौनसा जीव है जिसे यदि दूसरे किसी जीव का दूध नहीं मिला तो उसका स्वास्थ्य बिगड़ जाता है ?* जवाब; ऐसा कोई भी जीव नहीं है जो दूसरे जीव का दूध न मिलने पर कुपोषण से मर गया हो या कमजोर हो गया हो. हाथी जैसे शक्तिशाली जीव को भी दूध की आवश्यकता नहीं है. जब कि हमारे पास लाखों विकल्प हैं पोषण के. *4) दूध का रंग सफ़ेद क्यों होता है ?* जवाब; हमारे रक्त में श्वेतकण [वाइट सेल- WHITE CELLS] होते है जो हमें रोग से या महामारी से लड़ने की शक्ति देते है, इंसान या जानवर के छोटे बच्चे के दाँत नहीं होते है, सो वो सभी खुराक नहीं ले सकता है. प्रकृति ने ऐसी रचना की है कि जब तक बच्चे को दांँत नहीं आते तब तक अपनी माँ के दूध से बच्चे को पोषण मिलता रहेगा और रोग से या महामारी से बच्चे को सुरक्षा मिलती रहेगी, सभी जीव के दूध का रंग सफ़ेद होता है जिस में अपनी माँ के दूध में श्वेतकण [वाइट सेल] भारी मात्रा में होते है जो सीधे ही माँ के रक्त से अलग हो कर दूध बने हुए होते है जिस से बच्चे की रोग प्रतिकारक शक्ति बनी रहती है, इसी कारण से दूध का रंग सफ़ेद होता है. जब दूध को आप दूसरे दिन उबालोगे तो मलाई का रंग हमारे घाव के परु जैसा पीला हो गया होगा. जो साबित करता है की श्वेतकण [वाइट सेल] की मृत्यु हुई. यह सब विज्ञान इस लिए बता रहे है की दूध जो है जो या त्यों जीव के बच्चे के पेट के लिए ही बना है. जैसे हम हमारे शरीर में किसी और जिव का रक्त नहीं लगा सकते उसी तरह किसी और जिव के श्वेतकण [वाइट सेल] हमें काम नहीं आएंगे, हमें पाचन तंत्र की परेशानी हो सकती है, हम खली पेट 2 लीटर दूध नहीं पी सकते हमारा पेट उसे पचा नहीं पायेगा. क्योंकि वो हमारी खुराक नहीं है. हमें खाली पेट केले खाने से कोई तकलीफ नहीं होगी. *5) आप के दूध के लिये कितने जीव की हत्या होती है ?* जवाब; एक सर्वेक्षण के आधार से गिनती करने पर 2500000 की जनसंख्या को रोज का दूध दिलाने के लिए प्रति वर्ष 100000 से ज्यादा नंदी या पाड़े की हत्या होती है. आप उन को जन्म दे कर हत्या करने पर गौ हत्या के सब से बड़े अपराधी हो. *_कृपया पशुदूध त्याग दीजिये वह हमारी खुराक नहीं है, किसी मासूम बेजुबान जीव का बलात्कार और क़त्ल करने के लिए आप कारण न बने_* 🙏🙏🙏🙏

Saturday, April 10, 2021

किसी का जीवन आपका भोजन नहीं हो सकता।

किसी का जीवन आपका भोजन नहीं हो सकता। आपके अंगुली में लगी चोट से कई ज्यादा दर्द इन निर्दोष पशुओं को सहना पड़ता है एक लेग पीस के लिए। इनके दर्द को महशुस करये और आज से ही पशु उत्पादों का सेवन करना बंद करये। #GoVegan

भारतीय दूध उघोग

भारतीय दूध उद्योग के कुछ तथ्य - 1. दूध उद्योग नर बछडे़ को रास्ते पर छोड़ देते है या तो उन्हें कत्लखाने भेज देते है - लिंग असंतुलन सांख्यिकी (Livestock Census 2012) भैंस: 15% नर, 85% मादा (भारत में 55% दूध का उत्पादन भैंस से आता है ) गाय: 35% नर और 65% मादा (42% दूध का उत्पादन गाय से आता है ) 2. बछड़ों को अपनी माँ से अलग कर दिया जाता है - 2017 में FIAPO ने 451 दूध डेयरी के अध्ययन में ये सामने आया कि 24% बछड़े पैदा होते ही हमेशा के लिए अपनी माँ से अलग कर दिए जाते है| 3. जबरन गर्भवती / यौन शोषण करना - गाय/भैंस अपने बछड़े के जन्म के बाद केवल 8-12 महिने के लिए दूध देते हैं। दूध की निरंतर सप्लाई के लिए, बछड़े के पैदा होने के दो महीने बाद ही दूधवाले उन्हें फिर से जबरन गर्भवती करते है ताकि वे फिर से नए बछड़े को जन्म दे सके 9 महीने के बाद| उन्हें कृत्रिम तरीकों से या जबरन सांड को उन पर चढ़ाके गर्भवती किया जाता है| Ministry of Agriculture and Farmer’s Welfare Data के अनुसार 2015-16 में भारत के 54% (1305 लाख जानवरों में से 704 लाख जानवर) प्रजनन योग्य गायों/भैसों को कृत्रिम तरीके से गर्भवती किया गया था| 4. बछड़ों को अपनी मां के दूध से वंचित कर दिया जाता है - गाय का दूध उसके बछड़ों के लिए है, ना कि मनुष्य के लिए। प्राकृतिक तौर पर बछड़े 9-12 महीने के लिए अपनी मां का दूध पीते है| FIAPO के 2017 में किये अध्ययन में सामने आया कि 451 दूध डेयरी के सर्वेक्षण में से 74 % दूध डेयरी ऐसे है जिन्होंने बछड़े से तीन महीने या उससे कम समय में ही दूध छुड़वा दिया| 5. ऑक्सीटॉसिन - FIAPO के 2017 में किये गए अध्ययन में सामने आया की सर्वेक्षण किये गए दूध उद्योग में से 47% दूध उद्योग ऐसे है जो अवैध और अविवेकी तरीके से ओक्सीटोक्सिन का उपयोग करते है. जब हार्मोनल इंजेक्शन दिया जाता है, गाय/भैंस को पेट में घंटों तक बहुत दर्द होता है जो प्रसव पीड़ा के समान है| 6. मशीन से दूध निकालना – मशीन से दूध निकालना बहुत ही पीड़ादायक है और इसके कारण गाय/भैंस के थन लाल हो जाते है और सूजन भी हो जाती है| उनके थनों को नुकसान पहुंचता है और इसके कारण उन्हें पीड़ादायक मस्तीतिस जैसी बिमारी भी हो जाती है| Rishibhai Jain 7. सींग निकालना और कली निकालना (disbudding) – इस क्रिया के दौरान और इस क्रिया के बाद भी गाय/भैंस को बहुत दर्द सहन करना पड़ता है| पशु चिकित्सकों द्वारा भी कोई संज्ञाहरण (anaesthesia – जिससे दर्द ना हो) नहीं दिया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है कि जब उनके साथ दुर्व्यवहार हो और पीटा जा रहा हों तब वे वापस लड़ ना सके। 8. नाक को रस्सी से खींचना या घुमाना – गाय/भैंस के नाक को रस्सी से खींचना या घुमाने से उनके बहुत ही संवेदनशील नाक के ससपेटम पर दबाव बनता है| इसके कारण उन्हें बहुत पीड़ा होती है जिससे उनके मालिक के लिए उनपर शासन करना आसान हो जाता है. नाक में छेद से शूरति दर्द के उपरांत, उन्हें जीर्ण (chronic) दर्द भी होता है और चोट भी लगती है. हाल ही में हुए अध्ययन के अनुसार, 62% गाय/भैसों को नाक में मामूली गंभीर चोटें देखी गईं है। 3% गाय/भैसों में घाव से लगातार खून बहता और 44% में मवाद वहाव पाया गया| 9. समयपूर्वमृत्यु (प्राकृतिक जीवन के पहले ही मृत्यु) – गायों/भैसों का प्राकृतिक जीवन लगभग 20-25 साल है। 4-7 साल की उम्र में गाय/भैंस लगातार निरंतर दुर्व्यवहार के कारण पर्याप्त दूध देना बंद कर देती हैं। ऐसी स्थिति पर, उनका पोषण करना कोई लाभदायक नहीं है और इसलिए उन्हें सड़को पर छोड़ दिया जाता है या कत्लखाने में बेच दिया जाता है। कत्लखाने भेजते समय उन्हें बहुत सारी संख्या में ट्रक में ठसाठस भर दिया जाता है| यह दु:खद यात्रा काफी दिनों तक चलती है और अंत में कत्लखानो में उन्हें मार दिया जाता है| सफ़ेद रेवोल्यूशन (दुग्ध क्रांति) ही पिंक रेवोल्यूशन (मांस क्रांति) का कारण है। भारत दुनिया में दूध का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। इसका मतलब यह भी है कि भारत बीफ (गौ/भैंस मांस) का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक(exporter) है और दुनिया में चमड़े का 5th पाँचवा सबसे बड़ा उत्पादक बनने का कारण है, जो पर्यावरण प्रदूषण मुख्यता जल प्रदूषण (उदाहरण के लिए गंगा नदी प्रदूषण) के साथ अन्य प्रदूषण का भी मुख्य कारण है। ये बात समझे कि मनुष्यों को जीवित रहने के लिए दूध की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वे वनस्पति से अपने सभी पोषण प्राप्त कर सकते हैं। वास्तव में, प्रकृति में कोई जानवर स्वाभाविक रूप से अन्य प्रजातियों का दूध पीता ही नहीं है। आप दुधारू वस्तुओं के विकल्प में मूंगफली, नारियल, बादाम, सोया, इत्यादि का दूध बना सकते है यह 12 मिनट की डोक्यूमेंट्री जरूर देखे : https://www.youtube.com/watch?v=30bCIsh3oh8 जियो और जीने दो। वीगन (पूर्ण शाकाहारी) बने।

अन्तर्राष्ट्रीय नशा निवारण दिवस

अन्तर्राष्ट्रीय #नशा निवारण दिवस ~ 26 जून। मैं काफी दिनों से सोच रहा था कि नशे पर अपने निजी विचार लिखूँ। आज नशा मुक्ति दिवस हैं तो उपयुक्त समय हैं। मैं एक ऐसे समाज (#ओड ) से आता हूँ जहाँ बच्चे के जन्म के कुछ दिन बाद ही शराब का नशा करवाना आम हैं। एक #रूढिवादी और #अधंविश्वासी पंरपरा के अनुसार शिशु के प्रथम बार बाल काटना जिसे स्थानीय भाषा में देवता को समर्पित 'झङूला करना' भी कहा जाता हैं। इस दिन दो बकरे की बलि और लगभग 10 हजार की शराब पी जाती हैं। फलस्वरूप मैं भी किसी नशे से अछुता नहीं रहा। मैंने लगभग बचपन से सभी नशे( शराब , ध्रुमपान , स्मैक , कोकिन ( Drugs ), गांजा , चरस किये हुये हैं। मैंने #Vegan बनने के बाद Drugs को तो उसी समय पुरी तरह से छोङ दिया था। मैं अभी हाल ही में क्या खाना चाहिए , क्या नहीं आदि पर स्टडी कर रहा हूँ और फिटनेस को लेकर काफी जागरूक हूँ। तत्पश्चात मैंने अभी विशेषकर शराब सभी नशे पूर्णतः रूप से आजीवन के लिए और 90% शुगर , रिफाइंड तेल , कोल्डड्रिंक , चिप्स, जंक फूड्स छोङ दिये। मैं फिट रहने के लिए नियमित दौङ करता हूँ। हम #वीगन बनकर सभी अनहेल्दी खाद्य पदार्थों को छोङकर वाकई शारीरिक और मानसिक रूप से मजबुत हो जाते हैं। शराब/बीयर ( नोट: बीयर भी शराब ही हैं क्योंकि इसमें एल्कोहॉल होता हैं) पर समाज में काफी भ्रांतियां और गलतफहमियां फैली हुई हैं कि शराब या थोङी शराब स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती हैं । देखिए , शराब की बोतल पर साफ-साफ लिखा होता हैं "शराब स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं"। कोई भी सर्टिफिकेट डाँक्टर आपको शराब पीने की सलाह कतई न देगा। जानवर कभी शराब नहीं पिते , मनुष्य भी एक जानवर हैं तो मनुष्य शराब क्यों पीये? नशा हमारे तन-मन और धन को नुकसान ही पहुँचाता हैं । समाज में नशे से घरेलु हिंसा, सङक दुर्घटना, असमय मौत, गंभीर बीमारियाँ, आर्थिक स्थिति खराब होना मुख्य दुष्परिणाम हैं। 'नशा छोङने के लिए जरूरत हैं बस एक इरादे की क्योंकि इरादे के आगे टिकती नहीं कोई मुश्किल'। 'नशे को कहे ना जीवन को कहे हाँ। #नशा #नशामुक्ति #शराब #सिगरेट #नशामुक्तिअभियान #ओड

Puppy

मेरे साथ बैठा यह puppy मुझसे कह रहा हैं कि महेन्द्र तुम Vegans लोग हम मूकबधिर प्राणियों के लिए अच्छा काम कर रहे हो । chalk Activism के दौरान अक्षय ने इस Puppy से अच्छी दोस्ती कर ली और नाम रखा - whitey । आपको जानकार आश्चर्य होगा कि यह है whitey पुरे 50 मिनट हमारे Activism में शामिल रहा । हमारे साथ साथ चलता रहा । chalk Activism में मैं और सिर्फ अक्षय न थे यह whitey भी शामिल था । 😊 धन्यवाद whitey . This puppy sitting with me is telling me that "Mahendra you Vegans are doing a good job for us speechless creatures. 😊 During chalk Activism, Akshay befriended this Puppy and named it - whitey. You will be surprised to know that whitey was involved in our Activism for over 50 minutes. He followed us everywhere. It was not just Akshay in chalk Activism, it also included whitey. Thanks whitey. 😊

गुलामी

दूध उद्योग में भैंसों और गायों को ग़ुलाम बना के रखा जाता है, उन्हें इतनी छोटी रस्सी से बांधा जाता है कि वो इधर से उधर ना हो सके। उनके जो बछड़े होते है उन्हें दूर बाँधकर रखा जाता है ताकि वो अपनी माँ का दूध ना पी सके। यह सब हमारी दूध की मांग की वजह से होता है। क्या आप दूध व दूध से बनी चीज़ों का उपयोग करके इसमें भागीदार बन रहे है? #ditchdairy #dairyiscruel

पूज्यनीय गाय माता

पुज्यनीय गाय माता जिसको गले से इस लोहे के यंत्र से बांधा हुआ। 😠😠 यह एक गांव की गाय हैं जिसको इंसानों ने इस तरह से बांध दिया क्योंकि इनका यह तर्क हैं कि गाय खुद का दुध पी जाती हैं। क्यों पी जाती हैं खुद का दुध? क्योंकि सिर्फ सुबह-शाम दुध निकालने के समय ही यह अपने बच्चे से मिल पाती हैं। दिनभर यह सङकों पर और इधर - उधर घूमती रहती हैं इसलिए इसके स्तनों में दुध भर जाता हैं तो इसको पीङा होने लगती हैं और मजबुरी में खुद का ही दुध पी जाती होगी। यदि हमेशा इसका बच्चा इसके पास रहे तो कतई यह खुद का दुध न पियेगी क्योंकि बच्चा दिनभर भूख लगने पर दुध पीता रहेगा। हमने इस लोहे को खुलने की कोशिश की लेकिन असफल रहें । यदि खोल भी देते तो दुध के लालची फिर से इसे बांध ही देते और शोषण करते रहते। #पशुक्रूरता #दुधछोङदयाजोङ #वीगनबनें #Govegan

Wednesday, April 7, 2021

मांसाहार

मांस मछरिया खात हैं, दुग्धपान सों हेत। ते नर जड़ से जाएंगे, ज्यों मूरी को खेत।। (जो मांस-मछली खाते हैं, और दुध पीते हैं, वे मनुष्य मूली की फसल के समान, जड़ से समाप्त हो जायेंगे।)

Sunday, April 4, 2021

कौनसा जानवर वयस्क होने के बाद भी दूध पीता हैं?

पश्न - कौनसा जानवर वयस्क होने के बाद भी दूध पीता है? इन्सान के अलावा कोई नहीं। हाहा!! दूध एक प्राकृतिक शिशुआहार है और सिर्फ इन्सान के अलावा सारे जानवर प्रकृति के नियमों का पालन करते हैं। मुझे एक जानवर का नाम बताएं जो कि किसी अन्य प्रजाति का दूध पीता है। कोई नहीं! वास्तव में प्रकृति ने हर प्रजाति की माँ का दूध उसी प्रजाति के बच्चे की जरुरत के हिसाब से बनाया है। कुत्ते के दूध में सिर्फ कुत्ते के बच्चे के लिए पोषण होता है, बिल्ली के दूध में बिल्ली के बच्चे के लिए, चूहे के दूध में उसके बच्चे के लिए, हाथी के दूध में हाथी के बच्चे के लिए, इत्यादि। इसी तरह A1 गाय का दूध A1 बछड़े के लिए, A2 दूध A2 बछड़े के लिए होता है। जर्सी गाय का दूध सिर्फ जर्सी गाय के बच्चे के लिए और होलस्टन गाय का दूध उसी की बच्चे के लिए। और इंसान का दूध भी इंसान बच्चे के लिए प्रकृति ने बनाया है। एक नवजात इंसान के बच्चे का वज़न कितना होता है और एक वर्ष बाद उसका वज़न कितना हो जाता है? एक इंसान के नवजात बच्चे का औसत वज़न ३ किग्रा. होता है और एक वर्ष बाद लगभग ७-१० किग्रा. तक हो जाता है। एक नवजात गाय/भैंस के बच्चे का वज़न कितना होता है और एक वर्ष में कितना हो जाता है? गाय/भैंस के नवजात बच्चे का औसत वजन १५-२५ किग्रा. तक होता है और एक वर्ष में १३०-१४० किग्रा तक पहुँच जाता है। जब किसी जानवर के बच्चे के दांत आ जाते हैं तो प्रकृति क्या संकेत देती है? और उसके शरीर में किस तरह के बदलाव आने लगते है? किसी बच्चे के दांत आना एक स्पष्ट संकेत है कि अब वह अपना भोजन चबा सकता है और अर्ध-ठोस/ठोस आहार ले सकता है, उसे तरल आहार की जरुरत नहीं है। इसी कारण बच्चे के अंदर धीरे धीरे लेक्टेस एंजाइम बनना बंद हो जाता है। यह एंजाइम दूध को पचाने में सहायक ही नहीं लेकिन आवश्यक होता है। इसीलिए अगर आप बड़े होने के बाद लेक्टोस को नहीं पचा सकते तो यह एक सामान्य बात है। वास्तव में सभी इंसान प्राकृतिक रूप से लेक्टोस को पचाने में असमर्थ होते हैं, और दूध पीने के बाद पेट फूलना, उल्टी होना, दस्त लगना, इत्यादि स्पष्ट संकेत हैं कि शारीर अब दूध में उपस्थित शर्करा (लेक्टोस) को पचाने में असमर्थ है। उसके बाद भी नियमित रूप से दूध का सेवन करने से शरीर में कई रोग जैसे उच्च-रक्तचाप, मधुमेह, ह्रदय-रोग, हड्डियाँ कमज़ोर होना, मुहांसे इत्यादि होने लगते हैं, यह सब दूध में उपस्थित संतृप्त वासा, कोलेस्ट्रॉल, होरमोन आदि के कारण उत्पन्न होते हैं। अगर इन्सान का 3-4 साल का बच्चा इंसान का दूध नहीं पचा सकता तो क्या आप सोच सकते हैं वो गाय/भैंस का दूध कैसे पचा सकता है जो कि गाय के बछड़े को एक साल में २० किग्रा से १३० किग्रा. तक बना देता है? आशा है आप का जवाब “नहीं” होगा। क्या आप सोचते हैं कि गाय/भैंस लगातार आजीवन दूध देती रहती है? जबकि प्रकृति में हर माँ का दूध कम होने लगता है, जब उसके बच्चे के दांत आने लगते हैं। वास्तव में बच्चा होने के ३ महीने बाद ही गाय/भैंस का योन शोषण होता है और एक इंसान कोहनी तक अपना हाथ उसकी गुदा में डाल कर एक नली की सहायता से उसकी योनी में नर का वीर्य डालता है जो कि उस गाय के लिए बहुत ही कष्टदायक और दर्दनाक होता है। इस तरह जो दूध आप पीते हैं वह उस गाय का होता है जो दूध देने के साथ-साथ गर्भवती भी होती है और गर्भवती होने के कारण उसके शरीर में कई तरह के होर्मोनल बदलाव होते हैं। और वह होरमोन उससे निकाले जाने वाले दूध और उसके मूत्र में भी आ जाते हैं। जब आप इस तरह के दूध का सेवन करते हैं तो यह होरमोन आपके शारीर में भी पहुँच जाते हैं। यही कारण है कि आजकल के बच्चों में ८-१० साल की मासूम उम्र में ही किशोरावस्था के लक्षण दिखाई देने लगते हैं।

दूध और दुग्ध पदार्थ के बारे में सब को ये जानकारी होना जरूरी है।।

दूध और दुग्ध पदार्थ के बारे में सब को ये जानकारी होना जरूरी है। कोई भी स्तनधारी प्राणी जैसे कि कुत्ता, बिल्ली, घोडा, गधा, इंसान, गाय, भैंस, ऊँट, जिराफ, हाथी इत्यादि के शरीर में दूध कब निर्माण होता है? केवल जब उसके बच्चा पैदा होता है। प्रकृति उनके शारीर में दूध क्यों बनाती है? ताकि उनका नया पैदा हुआ बच्चा अपनी माँ का दूध पी कर कम समय में तेजी से बढ़ सके। बच्चों के दांत नहीं होते इसलिए उन्हें तरल भोजन की आवश्यकता होती है। तो वास्तव में दूध क्या होता है? यह बच्चों का भोजन है। जब आप गाय या भैंस का दूध निकालते हैं तो इसको क्या कहेंगे? बच्चों का भोजन चुराना। जिम्मेदार व्यक्ति के रूप में, क्या आपको यह उचित लगता है? आशा है आप का उत्तर अवश्य ही “ना” होगा। इसका मतलब है की आप दयालु और अच्छे इंसान हो। तो आप ऐसा क्यों कर रहे हैं? क्योंकि समाज ने हमें कभी यह महसूस करने नहीं दीया कि यह एक पाप है या इसमें कुछ गलत है। समाज ने हमे अभी तक अन्धकार में रखा हैं और इस प्रताड़ना और अत्याचार को समाज में सहज रूप से स्वीकार किया गया है। चूँकि यह सब हमे दिखाई नहीं देता और यह कार्य पूरे दुनिया में सामान्य और ज़रूरी स्वीकारा जाता हैं, यह एक अदृश्य प्रमुख विचारधारा है। इसलिए इस पर कोई प्रश्न भी नहीं उठाता।कोई भी प्रजाति के बच्चे को अपनी माँ का दूध दिन में कितनी बार पीना चाहिए? प्रत्येक 2-3 घंटे में। बच्चे को अपनी माँ का दूध कितना पीना चाहीये? जितना बच्चा चाहे, कोई माता-पिता कभी बच्चे को माँ का दूध पीने से नहीं रोकते। हम गाय/भैंस का दूध दिन में कितनी बार निकालते हैं? दिन में दो बार, सुबह और शाम। जब हम उसका दूध दिन में सिर्फ दो बार निकालते हैं तो उसके उपर क्या गुज़रती है? वास्तव में माँ के स्तन हर 2-3 घंटे में खाली होने चाहिए, लेकिन हम 12 घंटे तक उसको दूध इकट्ठा करने को मजबूर करते हैं, जो कि किसी भी माँ के लिए बहुत कष्टदायक और दर्दनाक होता है। हम उसके बच्चे को कितना दूध पिलाते हैं? अगर वो बछिया है तो सिर्फ उसे उतना दूध पीने देते हैं जिससे वह बस ज़िंदा रहे और अगर वह बछड़ा है तो उसे बिलकुल भी दूध नहीं पीने दिया जाता। उसे भूखा रख के मारा जाता हैं, क्योंकि बछड़ा बड़ा होकर हमें दूध देने वाला नहीं हैं। अगर हम बच्चे को उसकी मन मर्जी से उसकी माँ का दूध पीने के लिए २४ घंटे आज़ाद कर दें तो हमारे चाय, कॉफ़ी, दही, पनीर, घी, मक्खन, मावा आइसक्रीम आदि के लिए कितना दूध बचेगा? बिलकुल नहीं बचेगा, अगर वह कृत्रिम नस्ल की गाय नहीं है तो। (पशुओं को ज्यादा दूध उत्पन्न करने के लिए उनकी कृत्रिम नस्लें तैयार करना भी उन पर अत्याचार ही है) ।

Benefits of becoming vegan (वीगन बनने के फायदे)

 

Benefits of becoming vegan.

Hello friends, I' Mahendra Beldar from jodhpur (Rajasthan).

मैं एक नाँन-वेज (मांसाहारी) फैमिली से Belong करता हूँ सो जन्म से ही मांस,दूध,अंडे खाना नार्मल था।

2018 के मध्य में नैतिक कारणों से #वीगन बन गया था । journey के दौरान पता चला कि इसके health benefits कितने अच्छे हैं। 

#Vegan बनने से पूर्व में  मोटा और बेढोल था। और  एक लंबे डिप्रेशन से गुजरने, मनोचिकित्सक ने तो Bioplar Disorder  होना भी बताया। खैर!

वीगन भोजन से धीरे-धीरे शारीरक और मानसिक स्वास्थ्य ठीक होने लगा। क्योंकि आप जैसा खाते हैं वैसा ही आपका मन होता हैं। मन ही आपको अच्छा कार्य करने के लिए प्रेरित करता हैं। 

मैं छ: महिने से नियमित रनिंग कर रहा हूँ और खाने में हमारा यही देशी खाना दाल-रोटी,फल-सब्जियां आदि खाता हूँ। पशुउत्पादों(मांस,दूध & दुग्ध) पदार्थ में कैसिन और कोलेस्ट्रॉल होता हैं जो हमारे स्वास्थ्य के लिए घातक हैं और आगे चलकर हमें गभीरं बीमारियां देता हैं। 

हम मनुष्य का वनस्पति आधारित (#Vegan) भोजन  हैं और हमारे  पाचन तंत्र की संरचना भी ऐसी ही बनी हुई हैं। 

हम वीगन बनकर बढती हुई गर्मी,ग्लोबल वार्मिंग,जानवरों,स्वास्थ्य और हमारे पर्यावरण को बचा सकते हैं। 

English:- 

Hello friends, I'm Mahendra Beldar from jodhpur (Rajasthan).

 I belong from a non-veg (non-vegetarian) family, so eating meat, milk, eggs was normal from birth.

 #vegan became due to ethical reasons in mid-2018.  During the journey we came to know how good its health benefits are.

 #Vegan was thick and bumpy before it was created.  And undergoing a prolonged depression, the psychiatrist even referred to being a Bioplar Disorder.  Well!

 Vegan food gradually led to recovery of physical and mental health.  Because your mind is what you eat.  The mind only inspires you to do good work.

 I have been running regularly for six months and eat our native food in pulses, roti, fruits and vegetables etc.  Animal products (meat, milk & milk) contain casein and cholesterol, which are dangerous to our health and later on give us serious diseases.

 We are man's vegetable based food (#Vegan) and the structure of our digestive system remains the same.

 By becoming vegan, we can save the increasing heat, global warming, animals, health and our environment.

Saturday, April 3, 2021

भारत में लोग अपने वंश को बढाने के लिए बहुत चिंतित रहते हैं!

 भारत में लोग अपने वंश को बढ़ाने के लिए बहुत चिंतित रहते हैं ! इस सोच के साथ लोग शादी करते है, बच्चे पैदा करते हैं कि हमें अपना वंश आगे बढ़ाना है ! मैंने पूछा – लड़का पैदा करना क्यों जरूरी है तो लोग कहते हैं कि वंश आगे बढाने के लिए लड़का पैदा करना जरूरी है।

मैंने कहा -अब मै चन्द्र गुप्त मौर्य तो हूँ नहीं, मेरे वंश का क्या दुनिया अचार डालेगी, मै क्यों वंश आगे बढाऊं।

प्रश्न यह है कि लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि बादशाह अकबर के भी वंश का आज कुछ अता पता नहीं तो आप कौन सा वंश चलाने निकले हैं !

वंश वृद्धि के लिए क्या केवल बेटा ही काफी है ? बिना स्त्री के वंश वृद्धि की कामना करने वाले इंसान तुम कितने नकली और दोहरे चरित्र वाले हो।

कुछ लोग वंश की सात पीढियों के लिए धन सम्पदा जोड़ने के लिए लग जाते है और इसके लिये वे गलत काम में भी गुरेज़ नहीं करते ! अक्सर ऐसे लोगों को उनकी औलाद ही घर से बाहर फेंक देती है !

वैसे भी मृत्यु के बाद किसने देखा है, अपने वंश का क्या हुआ ? नाम जिंदा रखने के लिए वंश बढ़ाना जरुरी नहीं होता बल्कि अच्छे काम करना जरुरी होता है। वास्तव में हमारे अच्छे काम ही हमारा वंश होता है।

   #Antinatalism

    #Childfree

     #Stopmakingbabies

जानवर भी तो बच्चे पैदा करते हैं।

 प्रश्न- जानवर भी तो बच्चे पैदा करते हैं, इसलिए इंसानी प्रजनन भी प्राकृतिक हैं सो बच्चे तो जरूर पैदा करने चाहिए।

उतर - जी बिल्कुल बच्चे पैदा करना प्राकृतिक ही हैं ।  प्राकृतिक रूप से एक महिला को लगभग 22 बच्चे होते हैं और होने भी चाहिए ( यह बिल्कुल प्राकृतिक हैं) लेकिन गर्भनिरोधक युक्तियां ( कंडोम, गर्भनिरोध गोलियां,नसबंदी) आदि क्यों लेते हैं यह तो अप्राकृतिक हैं । 

रही बात जानवर की,जानवर को जब प्रसव होता हैं तो जानवर बिना किसी की मदद के खुद ही बच्चा जन लेता हैं लेकिन इंसानी मादा का बच्चा नर्स/डाक्टर,दाई की मदद से  और आजकल तो सीजर से ही सीधे । 

इंसानी नवजात शिशु को पैदा होते ही स्नान और कपङे पहनाये जाते हैं ( यह तो अप्राकृतिक हैं ) ।

जबकि जानवर अपने बच्चे को स्वंय  ही जीभ से चाटकर साफ करता हैं । 

आज तक कोई जानवर किसी अपराध में जेल नहीं गया और फांसी पर नहीं लटका । न किसी जानवर ने अपनी मां के अलावा किसी दूसरे की मां का दुध छीनकर पीया हो !

अत: महान इंसानों जानवरों से अपनी तुलना मत करो उनकी तरह आप कभी नहीं हो सकते ।

बच्चे पैदा नहीं करेगें तो वंश कैसे चलेगा?

 समाज- बच्चे पैदा नहीं करेंगे तो वंश कैसे चलेगा हमारा?

- मतलब स्वर्ग-नरक या जहाँ भी रहोगे मरने के बाद देखने आ गया कि क्या वंश सही से चल रहा है या नहीं!

* ... और अगर खत्म भी हो गया तो किसका तूफान आ जाएगा धरती पर ... *

* और एक खास बात ... मर्दानगी और जनानगी का सबूत देने के लिए खुद का बच्चा पैदा करना जरूरी नहीं, कितने बच्चे पाल सकते हैं ये जरूरी है *।