Sunday, June 20, 2021
मृत्युभोज- गंगाप्रसादी एक अभिशाप।
मृत्यु भोज-गंगाप्रसादी एक अभिशाप, कुरीति, बुरार्इ एवं सामाजिक महाबिमारी
मृत्युभोज एक अभिशाप है। न जाने कब किस समय किस ने मृत्युभोज की परम्परा चलार्इ जिसे अनजान व अज्ञानी लोगों ने आंख मूंद कर इसे स्वीकार कर लिया। मनमौजी लोगों ने मृत्यु पर मौजमस्ती का मार्ग अपना लिया। बडे ही खेद की बात है कि जो प्रिय जीव, हमारे परिवार का प्रेमी सदस्य, सदा के लिए, हमसे बिछुड कर चला गया, जो कभी भी इस रूप में वापस नहीं आना है, यह समय सर्वाधिक दु:ख, शोक की घडी का एवं चिंता का होता है। इस अवसर पर घी, शक्कर का चूरमा, हलवा व तरह-तरह के मिष्ठान खाना किसी भी दृषिट से क्या मानवीय आचरण कहा जा सकता है ? नही, कभी नही मुझे आश्चर्य होता है, लोग विचार क्यों नही करते ? धर्म के जानकारों से प्रश्न क्यों नही करते ? गीता, रामायण, महाभारत एवं वेदों का अध्ययन क्यो नहीं करते ? ज्ञानियों से जिज्ञासा प्रकट क्यों नही करते ? कानून के जानकारों एवं सरकार से सलाह क्यों नही लेते ?
धर्मगुरू श्रीमान दीवान साहब ने अपनी शब्दवाणी में स्पष्ट कहा है जो कुछ कीजे मरणे पहले इसी तरह श्रृति ने कहा जीव तो वाक्य करणात अर्थात जो कुछ करना है, जो भी करणीय है, करने लायक है, करना संभव है, किया जा सकता है, (इसमें सब कुछ आ गया है) वह अपने (मृतक के) जीवन काल में कर लेना चाहिए।
कर्म जीव के जीवन काल में ही होते है मरने के बाद नहीं। सामान्यत: जीव से इस जीवन में पाप और पुण्य दोनेां होते है। पुण्य का फल है, स्वर्ग, पाप का फल है नरक। पुण्यात्मा मनुष्ययोनि अथवा देवयोनि को प्राप्त करते है। पापात्मा पशु-पक्षी, कीट-पतंग आदि तिर्यक एवं अन्य योनियां प्राप्त करते है। शास्त्रों में हमारी श्रद्धा क्यों नही है ? अगर श्रद्धा है तो हमारे कर्म शास्त्रोक्त क्यों नहीं है ?
गीता के 17वे अध्याय के श्लोक 8, 9 व 10 में सातिवक, राजस व तामस आहार का वर्णन आया है। सातिवक मनुष्य भोजन में प्रवृत होता है जो पहले उसके परिणाम पर विचार करता है, राजस मनुष्य राग के कारण सर्वप्रथम भोजन को ही देखता है, उस के परिणाम पर विचार करता ही नहीं, तामस मनुष्य मूढता के कारण न भोजन पर न उसके परिणाम पर विचार करता है, वो तो केवल खाने में रूचि रखता है। हमारे जीवन में शुद्ध आहार का बडा भारी महत्व है, आहार शुद्धौ सत्व शुद्धौ धु्रव स्मृति। अपवित्रता दो प्रकार की होती है- जनना शौच व मरणा शौच। एक होता है सूतक, एक होता पातक। दोनों ही अवसरों पर जो भोजन घर में बनता है वह अपवित्र होता है। इसलिए कर्र्इ लोग सूतक की अवधि में सूतक वाले के घर भोजन नहीं करते, मगर बडे अफसोस की बात है कि घर में जब किसी की मृत्यु होती है, तो अंतिम संस्कार के पश्चात ही कर्इ क्षेत्रों में पकवान बनाकर खाया जाता है, जो हर दृषिट से अनुचित व अशोभनीय है।
कुछ वर्षो पहले तक तो मृत्यु के अवसर पर मृतक परिवार के घर में प्रथम दो दिन चूल्हा भी नही जलता था और उस परिवार के रिश्तेदार व पडौसी लोग दलिया, राबडी इत्यादि साधारण भोजन लाकर खिलाते थे। गरूडपुराण में भी ऐसा ही उल्लेख है कि पातक अवधि में मृतक परिवार को भोजन बाहर से लाकर खिलाया जाए। शास्त्रों व सन्तों के उपदेशों में ऐसा उल्लेख आया है कि मृत्यु के अवसर पर मृतक के परिवार में जो मेहमानों के लिए भोजन बनाता है वह जाने वाले जीव के निमित बनता है उस जीव के पूर्व के असंख्य जन्मों के पाप उस अन्न में होते है। अत: उस अन्न को अपवित्र माना गया है। इस संदर्भ में यहां यह उल्लेखनीय है कि एक बार स्वामी श्री रामसुखदासजी महाराज से एक श्रोता ने प्रश्न किया कि - श्राद्ध का अन्न ग्रहण करना चाहिए या नहीं ? स्वामी जी ने कहा - घर के लोग श्राद्ध का अन्न खाए तो कोर्इ दोष नही क्योंकि मरने वाला अपना स्वजन है, परन्तु दूसरों को कभी भी नहीं खाना चाहिए अर्थात किसी को वहां अन्न व जल ग्रहण नहीं करना चाहिए।
धार्मिक दृषिटकोण से मृत्यु भोज का परित्याग पश्चात भौतिक दृषिट से देखा जाए तो अनावश्यक एवं निराधार, अकारण ही मृतक परिवार को आर्थिक हानि होती है जिसे कतर्इ उचित नहीं कहा जा सकता। ऐसे आयोजनो में किसी प्रकार का नशा भी सेवन नही करना चाहिए। आदर्श परम्परा के दृषिटकोण से यदि इतिहास की ओर नजर दौडार्इ जाए तो भगवान श्रीरामजी के पिता अयोध्या के महाराजा श्री दशरथजी के देहान्त पर मृत्युभोज का आयोजन तो दूर रहा, पूरी अयोध्या में किसी के घर भोजन नहीं बना, सभी ने उपवास किया और श्रीरामजी जो मर्यादा पुरूषोतम राम कहलाते है, वे तो शोक प्रकट करने अयोध्या तक नही आए, बलिक उन्हें मृत्यु की सूचना मिलने पर उन्होनें कन्दमूल जैसे साधारण भोजन के साथ 12 दिन का शोक जंगल में मनाया।
मेरे समाज के लोगों! जरा सोचो! हम इतने भूखे क्यों है ? हमारे प्रियजन, परिवारजन के वियोग की घड़ी में त्यौहार सम भोजन बनाकर उसकी मौत की क्यों मजाक उड़ा रहे है ? क्या हम में पशु-पक्षियों के बराबर भी संवेदनशीलता नहीं है ? कुतिया का बच्चा मर जाए तो कुतिया रोटी खाना छोड़ देगी। भैंस अथवा गाय का बछड़ा मर जाए तो घास खाना छोड देगी। हम अपने स्वजन की मृत्यु पर पकवान खाना कब छोड़ेगे ? इस पर हम सभी को गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
आधुनिक समय में भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति एवं राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री रहे माननीय श्री भैरोसिंह जी शेखावत एवं जयपुर की पूर्व महारानी माननीया गायत्री देवी जो करोड़ों की सम्पति पीछे छोड गर्इ, के देहावसान पर किसी प्रकार का भोज आयोजित नहीं हुआ तथा पुलिस विभाग के भूतपूर्व महानिदेशक श्री शान्तनुकुमार जी के आकसिमक निधन पर तीये की बैठक पर एक घण्टे का भजन एवं कीर्तन का आयोजन हुआ। किसी भी अतिथि ने भोजन नहीं किया।
कानूनी दृषिटकोण से भी मृत्युभोज एक अपराध है। आज के वैज्ञानिक एवं भौतिकवादी जमाने की रफतार में हम अपराधी क्यों बनें ? अनावश्यक पुरानी परम्परा को पकडकर पिछडेपन का सबूत क्यों पेश करें ? धर्म गुरू श्रीमान दीवान साहब एवं श्री माताजी की शब्दावली एवं धार्मिक भावना की उपेक्षा क्यों करे ?
मृत्युभोज बाबत हम सभी को समग्र रूप से इसके पक्ष और विपक्ष को अच्छी तरह से समझना होगा। यह एक गम्भीर बुरार्इ, कुरीति एवं सामाजिक महाबिमारी है। आत्मबल और मनोबल की सहायता से ही इस कुरीति पर विजय पा सकते है, हम सभी को इसका सामना करने के लिए दृढ संकल्प लेने की आवश्यकता है
ईश्वर की कल्पना कैसे उत्पन्न हुई?
ईश्वर की कल्पना कैसे उत्पन्न हुई?
(1) हम नास्तिक लोग कहते हैं कि ईश्वर नहीं है, सिर्फ ईश्वर की कल्पना है। मनुष्य ने खुद कल्पना करके ईश्वर बनाया है। लेकिन ये कल्पना कब की? क्यों की? और मनुष्य के दिमाग में ऐसा खयाल आया कैसे?
(2) पांच दस हजार पूर्व हमारे पूर्वज का दिमाग विकसित हो चूका था। जिज्ञासा भी थी लेकिन उसके पास ज्ञान प्राप्त करने के साधन सिमित थे। सत्य तक पहुंचने की क्षमता कम थी।
(3) जीवन कठिन था। पुर, भूकंप, बारिश, चक्रवात, ठंड, गर्मी, बिमारी, भूख, दर्द, म्रृत्यु का उसके पास कोई उपाय नहीं था। नदी, पर्वत, सूर्य, चंद्र और जंगली जानवरों से वो डरता था।
(4) तब हमारे पूर्वज ने ईश्वर की कल्पना की। अगर कोई व्यक्ति कल्पना करेगा तो उसने जो देखा है उसके मुताबिक ही कल्पना करेगा। हमारे पूर्वज ने अपनी समझ के अनुसार कल्पना की। उसने देखा हमारे कबीले का संचालन करने वाला कोई सरदार है उसी तरह दुनिया को चलाने वाला भी कोई होना चाहिए।
(5) कबीले के सरदार को बिनती करो तो वो समस्याओं का उपाय करता है उसी तरह ईश्वर भी प्रार्थना करने से हमारी समस्याओं का समाधान करेगा। कबीले का सरदार मान सम्मान, खुशामद और भेट सौगात से खुश होता है इसी तरह मान सम्मान, खुशामद और भेट सौगात से ईश्वर भी खुश होगा। आरती और स्तुति क्या है? खुशामद ही है। प्रसाद और चढ़ावा एक प्रकार की भेट सौगात (रिश्वत) ही है।
(6) जैसे कबीले का सरदार नाराज होता है तो सजा देता है उसी तरह ईश्वर भी नाराज हो जायेगा तो सजा देगा और इसलिए ईश्वर से डरना चाहिए ऐसी कल्पना की गई। ईश्वर को खुश करने के लिए पूजा करने की शुरुआत हुई।
(7) राजशाही शुरू होने के बाद राजा और उसके सलाहकारों (पुरोहित, पादरी, मौलवी) ने अपने लाभ के लिए इस डर का इस्तेमाल किया। जनता में कुछ लोग थे जो राजा से नहीं डरते थे। उनको कहा कि राजा ईश्वर का प्रतिनिधि हैं, उसकी आज्ञा का पालन नहीं करोगे तो ईश्वर दंड देगा। ईश्वर उपर से सब देखता है (जैसे सबसे बड़ा सीसीटीवी कैमरा) इसलिए हर धर्म में भक्त लोग प्रार्थना या इबादत करते वक्त उपर देखते हैं।
(8) इस तरह ईश्वर अल्लाह गोड सिर्फ़ एक कल्पना है। और कुछ नहीं है। ईश्वर से डरना छोडिये। आपको कुछ नहीं होगा। ईश्वर को छोडने कुछ पाप होगा तो वो पाप मेरे।
शहीद रीगन रशेल की पहली बरसी पर श्रद्धांजलि।
शहीद रीगन रशेल की पहली बरसी पर आपको श्रद्धांजलि ❤️
कनाडा की पशु अधिकार कार्यकर्ती रीगन रशेल की पिछ्ले साल 19 जून को एक कत्लखाने के बाहर ट्रक से कुचलकर हत्या कर दी गई जब वे अपने साथियों के साथ एक कत्लखाने में कत्ल के लिए ट्रकों में ठूँसकर लाए जा रहे पशुओं को उनके अंतिम समय में पानी पिला रही थीं व उन्हें प्यार कर रही थीं। रीगन रशेल ने अपना पूरा जीवन पशुओं को उनकी प्राकृतिक आज़ादी और शोषण से मुक्ति दिलाने का प्रयास करने में लगा दिया था।
हर साल सैकड़ों पशु-प्रेमियों को पशुओं की जान बचाते हुए अपनी जान गंवानी पड़ती है और वे भी उसी प्रकार स्मरण किये जाने चाहिए जैसे हमारी स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने वाले क्रांतिकारियों को हम याद करते हैं। आज पूरी दुनिया में रीगन रशेल के शहीद दिवस पर उन्हें याद किया जा रहा है और विभिन्न कार्यक्रम हो रहे हैं।
वे पशु जिन्हें हमने मांस, दूध, अंडा आदि का पिंड समझ लिया है, वे भी प्राकृतिक आज़ादी के हक़दार हैं और उन्हें भी सभी प्रकार के शोषण से मुक्ति मिलना चाहिए। आइये हम सभी #Vegan बनकर पशुओं को सभी प्रकार के शोषण से आज़ाद करें और रीगन रशेल समेत सभी बलिदानियों का सम्मान करें। 🙏
वीगन (Vegan) का क्या अर्थ हैं?
वीगन ( vegan ) का क्या अर्थ है ? वीगन का अर्थ है वह व्यक्ति जो विशेष रूप से खाने पीने में सभी प्रकार के पशु उत्पादों का इस्तेमाल नहीं करता । जैसे जानवरों का गोश्त , दूध व दूध से बने उत्पाद । एक वर्ग तो चमड़े की वस्तुओं का प्रयोग भी नहीं करता । यह संसार समस्त जीवों के रहने के लिए बना है लेकिन मनुष्य ने सबसे ताक़तवर और बुद्धिमान होने के नाते अपनी क्षमताओं का दुरुपयोग कर प्रकृति और समस्त जीवों का दोहन करना शुरू कर दिया और नैतिकता की परिभाषा भी मानव कल्याण तक सीमित रखी । जो हमें ठीक लगा बस वही नैतिक है । माँसाहार और दुग्धाहार दोनों को अनैतिक नहीं माना , तर्क ये दिया जाता है कि हमारे जीवित और स्वस्थ रहने के लिए यह ज़रूरी है । ये तर्क survival of the fittest को सही मानता है । क्या हमने कभी सोचा है कि इसी सिद्धांत को मानते मानते हमने मनुष्यों का भी इस्तेमाल और शोषण शुरू कर दिया है । अगर हम जानवरों , प्रकृति और पेड़ पौधों का शोषण करना सही मानते हैं तो इसकी तार्किक परिणति ( logical end ) मनुष्यों के शोषण में ही होगी । जब हमने जानवरों को जीव ना समझ कर संपत्ति या वस्तु समझा तो सारे समाज ने इसे स्वीकार कर लिया लेकिन ये व्यवस्था आगे बढ़ी और पुरुषों ने महिलाओं को , अमीरों ने ग़रीबों को , बड़ों ने बच्चों को , गोरों ने कालों को , ऊँची जाति वालों ने तथाकथित निचली जातियों को वस्तु समझना ( commodification ) शुरु कर दिया । माँसाहार के विरुद्ध तर्कों से तो सब परिचित हैं । दूध पीने के विरोध में वीगन तर्क ये हैं : 1. दूध पर पशु के बच्चे का हक़ है जिस तरह मानव के बच्चे का माँ के दूध पर है । 2. दूध निकालने की प्रक्रिया में पशु की कोई सहमति नहीं होती , ये उसके साथ ज़बरदस्ती है , ये प्रक्रिया पशु के लिए पीड़ादायी भी है क्योंकि पहले उसके बच्चे को थन के पास लाया जाता है और जब दूध उतर जाता है तो बच्चे को खींचकर माँ से अलग कर देते हैं और दूध निकाल लेते है । 3. कुछ वीगन जैसे मेनका गाँधी दूध को मांसाहार की श्रेणी में रखते हैं । 4. मानव पशु को संपत्ति की श्रेणी में रखता है जो जीव के प्रति हिंसक व्यवहार है ।
Thursday, June 17, 2021
Joaquin Phoenix
"मुझे लगता है कि कई बार हम यह महसूस करते हैं या हमें महसूस कराया जाता है कि हम किसी न किसी क्षेत्र के चैंपियन हैं। लेकिन मेरे लिए हम सब एक बराबर है। मेरा मानना है चाहे हम लैंगिक असमानता की बात करें या जातिवाद या समलैगिंक या जन जातियों के अधिकारों या फिर जानवरों के अधिकारों की बात करें वास्तव में हम अन्याय के खिलाफ लड़ाई के बारे में बात कर रहे हैं। हम उस विश्वास के खिलाफ लड़ाई के बारे में बात कर रहे हैं जो यह मानता है की किसी एक राष्ट्र, एक समाज के लोग, एक जाति, एक लिंग, एक प्रजाति को किसी दूसरे पर हावी होने, उनका उपयोग करने और नियंत्रित करने का अधिकार है। हम असल दुनिया से बहुत अलग हो गए हैं। हम में से कई लोग एक अहंकारी सोच रखते हैं की इंसान दुनिया में सबसे ऊपर है। हम इस दुनिया के सभी संसाधनों को खुद के लिए समझते है उनका उपभोग करते हैं।
हम एक गाय को कृत्रिम रूप गर्भधारण करवाते हैं और फिर उसके नवजात बच्चे को उससे चुरा लेते हैं। फिर उसके बछड़े के हिस्से के दूध से अपने लिए कॉफी और खाना बनाते हैं। हम खुद को बदलने से डरते है क्यूंकि हमें लगता है की कुछ आदतें छोड़ने के लिए हमें बहुत कुछ बलिदान करना पड़ेगा।
लेकिन इंसान की सबसे बड़ी अच्छाई है की वह सबकुछ कर सकता है और मुझे लगता है अगर हम प्यार और करुणा का अनुसरण करें तो हम एक ऐसी प्रणाली विकसित कर सकते हैं जो सभी संवेदनशील प्राणियों और पर्यावरण के लिए फायदेमंद हो।“
अन्तर्राष्ट्रीय नशा निवारण दिवस ~ 26 जून।
अन्तर्राष्ट्रीय #नशा निवारण दिवस ~ 26 जून।
मैं काफी दिनों से सोच रहा था कि नशे पर अपने निजी विचार लिखूँ। आज नशा मुक्ति दिवस हैं तो उपयुक्त समय हैं।
मैं एक ऐसे समाज (#ओड ) से आता हूँ जहाँ बच्चे के जन्म के कुछ दिन बाद ही शराब का नशा करवाना आम हैं।
एक #रूढिवादी और #अधंविश्वासी पंरपरा के अनुसार शिशु के प्रथम बार बाल काटना जिसे स्थानीय भाषा में देवता को समर्पित 'झङूला करना' भी कहा जाता हैं। इस दिन दो बकरे की बलि और लगभग 10 हजार की शराब पी जाती हैं।
फलस्वरूप मैं भी किसी नशे से अछुता नहीं रहा। मैंने लगभग बचपन से सभी नशे( शराब , ध्रुमपान , स्मैक , कोकिन ( Drugs ), गांजा , चरस किये हुये हैं।
मैंने #Vegan बनने के बाद Drugs को तो उसी समय पुरी तरह से छोङ दिया था।
मैं अभी हाल ही में क्या खाना चाहिए , क्या नहीं आदि पर स्टडी कर रहा हूँ और फिटनेस को लेकर काफी जागरूक हूँ। तत्पश्चात मैंने अभी विशेषकर शराब सभी
नशे पूर्णतः रूप से आजीवन के लिए और 90% शुगर , रिफाइंड तेल , कोल्डड्रिंक , चिप्स, जंक फूड्स छोङ दिये।
मैं फिट रहने के लिए नियमित दौङ करता हूँ। हम #वीगन बनकर सभी अनहेल्दी खाद्य पदार्थों को छोङकर वाकई शारीरिक और मानसिक रूप से मजबुत हो जाते हैं।
शराब/बीयर ( नोट: बीयर भी शराब ही हैं क्योंकि इसमें एल्कोहॉल होता हैं) पर समाज में काफी भ्रांतियां और गलतफहमियां फैली हुई हैं कि शराब या थोङी शराब स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती हैं ।
देखिए , शराब की बोतल पर साफ-साफ लिखा होता हैं "शराब स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं"। कोई भी सर्टिफिकेट डाँक्टर आपको शराब पीने की सलाह कतई न देगा।
जानवर कभी शराब नहीं पिते , मनुष्य भी एक जानवर हैं तो मनुष्य शराब क्यों पीये?
नशा हमारे तन-मन और धन को नुकसान ही पहुँचाता हैं ।
समाज में नशे से घरेलु हिंसा, सङक दुर्घटना, असमय मौत, गंभीर बीमारियाँ, आर्थिक स्थिति खराब होना मुख्य दुष्परिणाम हैं।
'नशा छोङने के लिए जरूरत हैं बस एक इरादे की क्योंकि इरादे के आगे टिकती नहीं कोई मुश्किल'।
'नशे को कहे ना
जीवन को कहे हाँ।
#नशा #नशामुक्ति #शराब #सिगरेट #नशामुक्तिअभियान #ओड
कॉफी coffee ☕
ब्लैक कॉफी विदाउट शुगर(बिना चीनी) अब स्वाद में शुमार हो गई।
ONLY THING IM ADDICTED TO ☕
☕
Coffee is one of the world’s most popular beverages.
Thanks to its high levels of antioxidants and beneficial nutrients, it also seems to be quite healthy.
☕
Studies show that coffee drinkers have a much lower risk of several serious diseases.
☕
Benefits:
1. Can Improve Energy Level
☕
2.Can Drastically Improve Physical Performance because caffeine increases epinephrine (adrenaline) levels in your blood.
☕
3.Contains Essential Nutrients(Riboflavin (vitamin B2): 11% of the Reference Daily Intake (RDI).
Pantothenic acid (vitamin B5): 6% of the RDI.
Manganese and potassium: 3% of the RDI.
Magnesium and niacin (vitamin B3): 2% of the RDI.)
☕
4. Can Fight Depression and Make You Happier
☕
5.May Lower Stroke Risk
☕
PS: above statement only supports "freshly brewed coffee".
Source : @healthline
https://www.healthline.com/nutrition/top-13-evidence-based-health-benefits-of-coffee#section11
Sunday, June 13, 2021
कबीर वाणी
कबीर अनूठे हैं। और प्रत्येक के लिए उनके द्वारा आशा का द्वार खुलता है। क्योंकि कबीर से ज्यादा साधारण आदमी खोजना कठिन है। *और अगर कबीर पहुंच सकते हैं, तो सभी पहुंच सकते हैं।* कबीर निपट गंवार हैं, इसलिए गंवार के लिए भी आशा है; बे—पढ़े—लिखे हैं, इसलिए पढ़े—लिखे होने से सत्य का कोई भी संबंध नहीं है। जाति—पांति का कुछ ठिकाना नहीं कबीर की—शायद मुसलमान के घर पैदा हुए, हिंदू के घर बड़े हुए। इसलिए जाति—पाति से परमात्मा का कुछ लेना—देना नहीं है।
कबीर जीवन भर गृहस्थ रहे—जुलाहे—बुनते रहे कपड़े और बेचते रहे; घर छोड़ हिमालय नहीं गए। इसलिए घर पर भी परमात्मा आ सकता है, हिमालय जाना आवश्यक नहीं। कबीर ने कुछ भी ने छोड़ा और सभी कुछ पा लिया। इसलिए छोड़ना पाने की शर्त नहीं हो सकती।
और कबीर के जीवन में कोई भी विशिष्टता नहीं है। इसलिए विशिष्टता अहंकार का आभूषण होगी; आत्मा का सौंदर्य नहीं।
कबीर न धनी हैं, न ज्ञानी है, न समादृत हैं, न शिक्षित हैं, न सुसंस्कृत हैं।
*कबीर जैसा व्यक्ति अगर परमज्ञान को उपलब्ध हो गया, तो तुम्हें भी निराश होने की कोई भी जरूरत नहीं।* इसलिए कबीर में बड़ी आशा है।
बुद्ध अगर पाते हैं तो पक्का नहीं की तुम पा सकोगे। बुद्ध को ठीक से समझोगे तो निराशा पकड़ेगी; क्योंकि बुद्ध की बड़ी उपलब्धियां हैं पाने के पहले। बुद्ध सम्राट हैं। इसलिए अगर धन से छूट जाए, आश्चर्य नहीं। क्योंकि जिसके पास बस है, उसे उस सब की व्यर्थता का बोध हो जाता है।
*गरीब के लिए बड़ी कठिनाई है—धन से छूटना। जिसके पास है ही नहीं, उसे व्यर्थता का पता कैसे चलेगा?* बुद्ध को पता चल गया, तुम्हें कैसे पता चलेगा? कोई चीज व्यर्थ है, इसे जानने के पहले, कम से कम उसका अनुभव तो होना चाहिए। तुम कैसे कह सकोगे कि धन व्यर्थ है? धन है कहां? तुम हमेशा अभाव में जिए हो, तुम सदा झोपड़े में रहे हो— *तो महलों में आनंद नहीं है, यह तुम कैसे कहोगे?* और तुम कहते भी रहो, और यह आवाज तुम्हारे हृदय की आवाज न हो सकेगी; यही दूसरों से सुना हुआ सत्य होगा। और गहरे में धन तुम्हें पकड़े ही रहेगा।
बुद्ध को समझोगे तो हाथ—पैर ढीले पड़ जाएंगे।
बुद्ध कहते हैं, स्त्रियों में सिवाय हड्डी, मांस—मज्जा के और कुछ भी नहीं है, क्योंकि बुद्ध को सुंदरतम स्त्रियां उपलब्ध थीं, तुमने उन्हें केवल फिल्म के परदे पर देखा है। तुम्हारे और उन सुदरतम स्त्रियों के बीच बड़ा फासला है। वे सुंदर स्त्रियां तुम्हारे लिए अति मनमोहक हैं। तुम सब छोड़कर उन्हें पाना चाहोगे। क्योंकि जिसे पाया नहीं है वह व्यर्थ है, इसे जानने के लिए बड़ी चेतना चाहिए।
*कबीर गरीब हैं, और जान गए यह सत्य कि धन व्यर्थ है। कबीर के पास एक साधारण सी पत्नी है, और जान गए कि सब राग—रंग, सब वैभव—विलास, सब सौंदर्य मन की ही कल्पना है।*
कबीर के पास बड़ी गहरी समझ चाहिए। बुद्ध के पास तो अनुभव से आ जाती है बात; कबीर को तो समझ से ही लानी पड़ेगी। ..................
............कबीर ने कहा, जब परमात्मा इतना बड़ा ताना—बाना बुनता है संसार का और लज्जित नहीं होता, तो मैं गरीब छोटा—सा ही काम करता हूं, क्यों लज्जित होऊं? जब परमात्मा इतना बड़ा संसार बनता है—जुलाहा ही है परमात्मा—में भी जलाहा; मैं थोड़ा छोटा जुलाहा, वह जरा बड़ा जुलाहा। और जब वह छोड़ के नहीं भाग गया, मैं क्यों भागूं? मैंने उस पर ही छोड़ दिया है, जो उसकी मरजी। अभी उसका आदेश नहीं मिला कि बंद कर दो।
वे जीवन के अंत तक, बूढ़े हो गए तो भी बाजार बेचने जाते रहे। लेकिन उनके बेचने में बड़ा भेद था, साधुता थी। कपड़ा बुनते थे, तो वे बुनते वक्त राम की धुन करते रहते। इधर से ताना, उधर से बाना डालते, तो राम की धुन करते। और कबीर जैसे व्यक्ति जब कपड़े के ताने—बाने में राम की धुन करें, तो उस कपड़े का स्वरूप ही बदल गया। उसमें जैसे कि राम की ही बुन दिया। इसलिए कबीर कहते हैं, झीनी झीनी बीनी रे चदरिया! और कहते हैं, बड?ी लगन से और बड़े प्रेम से बीनी है। और जब जाते बाजार में, तो ग्राहकों से वे कहते कि राम, तुम्हारे लिए ही बुनी है, और बहुत सम्हाल के बुनी है। उन्होंने कभी किसी ग्राहक को राम के लिए सिवा और दूसरों कोई संबोधन नहीं किया। ये ग्राहक राम हैं। यह इसी राम के लिए बुनी है। ये ग्राहक ग्राहक नहीं हैं और कबीर कोई व्यवसायी नहीं हैं।
कबीर व्यवसाय करते रहे और सादे हो गए। उन्होंने सादगी को अलग से नहीं साधा। अलग से साधोगे कि जटिल हो जाएगी। सादगी साधी नहीं जा सकती। समझ सादगी बन जाती है।
कबीर ने अपने को इतना मरजी पर छोड़ दिया परमात्मा की, सुबह लोग भजन के लिए इकट्ठे हो जाते, तो कबीर उनसे कहते कि ऐसे मत चले जाना, खाना लेकर जाना। पत्नी—बच्चे परेशान थे: कहां से इतना इंतजाम करो! उधारी बढ़ती जाती है। कर्ज में दबते जाते। रोज रात को कमाल कबीर का लड़का, उनसे कहता कि अब बस हो गया, अब कल किसी से मत कहना! कबीर कहते, जब तक वह कहलाता है, तब तक हम क्या करें? तुम्हारी सुनें कि उसकी सुनें? जिस दिन वह बंद कर देगा, कहनेवाला कौन! हम अपनी तरफ से कुछ करते नहीं और तुम क्यों परेशान हो? जब वह इतना इंतजाम करता है, यह भी करेगा! ........................
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समुंदर बोल रहा हूँ।
पृथ्वी का ७०% हिस्सा यह पानी से ढका हुआ है और उसे नष्ट करना यह अपने विनाश को खुद ही आमंत्रित करने जैसा है। औद्योगिक मछली पकड़ना हमारे महासागरों को प्रदूषित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मनुष्यों के भोजन और जानवरों के चारे के लिए अलग अलग तरह की मछलियों को चुराना, प्रवाल भित्तियों को खोदना, मछली पकड़ने में इस्तेमाल किए गए गियर और प्लास्टिक को फेंकना, तेल फैलाना, कीटनाशकों और उर्वरकों को समुद्र में बहाना इन तरीकों से हम न केवल पानी को दूषित कर रहे है बल्कि ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ावा देकर अपने जीवन को भी खतरे में डाल रहे हैं। समुद्र मछलियों के लिए हैं न की जहाजों के लिए। यह समय है कि हम अपने महासागरों के साथ अपने जीवन को भी बचाएं।
Honey is not vegan!
शहद वीगन नहीं है क्योंकि मधुमक्खियां शहद उनके लिए बनाती है न कि हमारे लिए। सच्चाई यह है की मधुमक्खियां अपना सारा जीवन एक फूल से दूसरे फूल जाकर शहद बनाने में लगा देती है; जो उनके पोषण के लिए महत्वपूर्ण होता है और हम इंसान उसे चुरा लेते है। मधुमक्खियों का शोषण किए बिना उनसे शहद प्राप्त करना असंभव है। शहद का औद्योगिक उत्पादन इससे भी कड़वा है - ड्रोन मधुमक्खियों से छेड़छाड़ की जाती है, रानी मधुमक्खियों को कृत्रिम रूप से गर्भवती किया जाता है और उनके पंख काट दिए जाते हैं। यह अत्याचार यहीं नहीं रुकता, सर्दियों में उत्पादन की लागत कम करने के लिए हीव्स जला दी जाती है। गाय, मुर्गी, बकरी, सूअर और मछली की औद्योगिक खेती की तरह ही व्यावसायिक मधुमक्खी पालन में किसी को भी मधुमक्खियों की चिंता नहीं होती है । व्यावसायिक दृष्टिकोण से यह स्पष्ट है कि लाभ के लिए मधुमक्खियों का शोषण किया जाता है और उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है। यहां तक कि अपने घरों से व्यापार करने वाले छोटे व्यापारी इन मधुमक्खियों को बंदी बनाकर उनके शहद चुरा लेते है। अपने आहार से शहद निकल कर आप मधुमक्खियों को बचाने में मदद कर सकते है।
Wednesday, June 9, 2021
प्यार में आत्महत्या
हमारे अजीज मित्र तथा मेरे देहदान के प्रेरणा स्त्रोत ललित जी दार्शनिक की कलम से....
बाडमेर जिले के चोहटन थाना क्षेत्र के लीलसर गांव में कल एक प्रेमी युगल ने एक दूसरे पर देशी कट्टे से चलाई स्वयं पर गोली दोनों ने प्रेम प्रसंग के चलते कर ली आत्महत्या।
पहले तो मैं आत्महत्या करने वाले प्रेमी युगलों से कहना चाहूँगा कि- अपने प्यार को मुकाम तक पहुँचाने के लिए आखरी सांस तक लड़ते, इतनी जल्दी हार क्यों मान ली ? जो समाज तुहें प्यार करने की इजाजत नहीं देता ऐसे असभ्य समाज के खिलाफ जंग जारी रखते और इन सामाजिक बंधनों को तोड़कर उन दरिंदों को धुल चटाते जो तुम्हारे प्यार के दुश्मन बने हुए थे l मरने से कुछ हासिल नहीं होता, जिन्दगी बार-बार नहीं मिलती l दोनों जीवन साथी बनकर इस जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त समाज के मुंह पर तमाचा मारते l
यह कैसा समाज बनाया है हमने ? क्या प्यार करना इतना बड़ा गुनाह है ? सोचिये जरा प्यार करने वालों की क्या गलती है, इन्हें किस बात की सजा मिलती है ? आखिर ये समाज प्रेमी युगल का दुश्मन क्यों है ? ये समाज निर्दोष प्रेमियों की जान कब तक लेता रहेगा ? इस समाज में सब कुछ करने की आजादी है लेकिन प्यार करने की नहीं l
इस समाज में बलात्कार करना जुर्म नहीं है लेकिन प्यार करना जुर्म माना जाता है l अगर किसी को प्यार की वजह से जिन्दगी भर की ख़ुशी मिलती है तो इसमें कौनसा जुर्म है l जब दो लोग आजाद पंछी की तरह खुलकर एक-दूजे के साथ जीवन जीना चाहें तो क्या गलत है l क्या प्यार करने वालों को अपनी निजी जिन्दगी जीने का हक़ नहीं है ? जब ये अपना भला-बुरा सोच समझ सकते हैं तो फिर जीवनसाथी चुनने का फैसला भी कर सकते हैं l
इस समाज ने राधा और कृष्ण को तो भगवान बना दिया लेकिन दो युगलों का प्रेम बर्दास्त नहीं है l जब दो व्यस्क आपस में प्यार करते हैं, शादी करना चाहते हैं और अपना जीवन जीना चाहते हैं तो उनके जीवन में बाधा डालने का अधिकार किसी को नहीं है, लेकिन हमारा ये अन्धविश्वासी समाज जाती और धर्म के नाम पर उनके प्यार का दुश्मन बन जाता है, उनकी हत्या करवा देता है या उनको इतना टॉर्चर किया जाता है कि वो खुद अपनी मौत को चुन लेते हैं l ना जाने ये जाती बीच में कहाँ से आ जाती है जो दो प्यार करने वालों के बीच दीवार बन जाती है l यहाँ समाज, जाती और धर्म को ही सब कुछ माना जाता है l क्या जाती और धर्म अपने बच्चों की ख़ुशी से बढ़कर होती है l
क्या हम ऐसे समाज को परिपक्व समाज कह सकते हैं ? हम 21वीं सदी में जी रहे हैं लेकिन हमारा समाज आज भी बार्बरिक युग में जी रहा है l कौन है जो इस जघन्य कृत्य को चुनौती देने की हिम्मत करेगा ? इसका जवाब कानून नहीं है, इसका जवाब हम सभी को अपने आप से पूछना है, इस समाज से पूछना है, जिसके बीच हम रहते है। हमें अपने आप को बदलना होगा, रूढ़िवादिता के चंगुल से स्वयं को और समाज को छुड़ाना होगा, जातिवाद के दलदल से बाहर आकर, ऊँच-नीच के भेद-भाव को ख़त्म करना होगा l अब चुप मत बैठिये समाज को मुंह तोड़ जवाब दें l आप भी समाज की एक कड़ी हैं और आपकी भी जिम्मेदारी बनती है कि ऐसे प्रेमी युगलों की मदद एवं सुरक्षा के लिए आगे आयें ताकि उन्हें अपनी जान ना गवानी पड़े l
ललित दार्शनिक...✍🏻
देहदान महादान
हमारा प्रथम कर्तव्य तो यही होना चाहिए कि हम हमारे परिवारजनों को हमारी इच्छा के बारे में बताते हुए जागृत करते रहे पंरतु हम उन्हें समझाने में नाकायाब रहे और कहीं हम बीच में चल बस या बहोत जागृत करने के बाद भी परिवारजन हमारे इच्छा की कद्र ना करते हुए मरणोपरांत हमारे मृत शरीर को जला देगे तथा देहदान ,अगंदान न करेगे ..., इसलिए यह वसीयत नामा ( इच्छा पत्र ) है जिसमे है की यदि मेरा प्राकृतिक देंहात होता है और घर वाले मेरी इच्छा की कद्र ना करते हुये देहदान व अगंदान ना करे तो कानून उसमे हस्तक्षेप करके देहदान , अगंदान करवा सकता है ..., इस वास्ते मेरे तमाम नजदीक मित्रों से निवेदन है कि मेरे देंहात के बाद यदि परिवारजन देहदान न करे तो आप कानून को सूचित करे ।
एक देह दान से 8 लोगो की जिंदगियां बचाई जा सकती है।
हर दिन लगभग 20 लोगो की मृत्यु होती है जिन्हें शरीर का ऑर्गन नहीं मिलता।
हमारे देश मे 10 लाख लोग कॉर्नियल ट्रांसप्लांट के इंतजार में बैठे है, 2,20,000 लोगो को किडनी की जरूरत है।
और हमारे देश मे अंग दान या देह दान करने वालो की संख्या बहुत ही ज्यादा कम है।
सोचिए आपके जाने के बाद भी आपके शरीर से कुछ और लोग जीवित रह सकेंगे।
हमारे ग्रुप के बहुत ही युवा, Mahendra Singh जी जो मात्र 20 वर्ष के है उन्हें ये इंसानियत समझ मे आयी और देह दान रजिस्टर करा दिया। उनका देहदान पेपर में भी निकला, उन्होंने बताया कि वो अन्धविस्वास छोड़ कर समाज की भलाई के लिए ये कदम उठाया।
उन्होंने पोस्ट किया था पर लोग अच्छे काम की सराहना करना नहीं जानते । खुद अच्छा करने की सोचते नही और कोई दूसरा कर रहा हो तो उसे प्रोत्साहित भी नहीं करते। इतनी कंजूसी कोस लिए ? दिल खोल कर सराहना करिये ऐसे लोगो की जो बेहतर कल चाहते है और इंसानियत के लिए कुछ करते है .. धन्यवाद महेंद्र जी 💐💐
DR.S.N medical collage, jodhpur.
डॉ. एस एन मेडिकल कॉलेज , जोधपुर मे हुआ इस साल का 14 वां देहदान...,
मै महेन्द्र सिंह ..., उस जालोर निवासी सीता देवी (78) धर्मपत्नी स्व. श्रीमान् मांगीलाल सोंलकी को शत् शत् नमन करता हूँ , जिन्होने देहदान का पंजीकरण करवाके , देहदान का संकल्प लिया और सीता देवी के परिजनों ने उनकी अतिंम इच्छा की कद्र करते हुये उनके देहांत के बाद उनके पार्थिव शरीर को मेडिकल विधार्थियों के शोध कार्य के लिये कॉलेज में दान कर दिया |
मैं महेन्द्र सिंह निवासी बिराई ..., नमन करता हूँ सीता देवी और उनके परिवारजनों को जिन्होने मानवता का फर्ज निभाया| अंधविश्वास को छोड़कर मानव कल्याण हेतु देहदान करके नेक कार्य किया , और पांखडी प्रथाओं का अंत करने मे सहयोग दिया | ये समाज के असली दानवीर है जो सराहनीय है | हमें इन पर गर्व है |
- महेन्द्र सिंह , पांखडो का विरोधी ..., अंधविश्वासों का सर्वनाश करने वाला ..., |
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