Wednesday, June 9, 2021
प्यार में आत्महत्या
हमारे अजीज मित्र तथा मेरे देहदान के प्रेरणा स्त्रोत ललित जी दार्शनिक की कलम से....
बाडमेर जिले के चोहटन थाना क्षेत्र के लीलसर गांव में कल एक प्रेमी युगल ने एक दूसरे पर देशी कट्टे से चलाई स्वयं पर गोली दोनों ने प्रेम प्रसंग के चलते कर ली आत्महत्या।
पहले तो मैं आत्महत्या करने वाले प्रेमी युगलों से कहना चाहूँगा कि- अपने प्यार को मुकाम तक पहुँचाने के लिए आखरी सांस तक लड़ते, इतनी जल्दी हार क्यों मान ली ? जो समाज तुहें प्यार करने की इजाजत नहीं देता ऐसे असभ्य समाज के खिलाफ जंग जारी रखते और इन सामाजिक बंधनों को तोड़कर उन दरिंदों को धुल चटाते जो तुम्हारे प्यार के दुश्मन बने हुए थे l मरने से कुछ हासिल नहीं होता, जिन्दगी बार-बार नहीं मिलती l दोनों जीवन साथी बनकर इस जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त समाज के मुंह पर तमाचा मारते l
यह कैसा समाज बनाया है हमने ? क्या प्यार करना इतना बड़ा गुनाह है ? सोचिये जरा प्यार करने वालों की क्या गलती है, इन्हें किस बात की सजा मिलती है ? आखिर ये समाज प्रेमी युगल का दुश्मन क्यों है ? ये समाज निर्दोष प्रेमियों की जान कब तक लेता रहेगा ? इस समाज में सब कुछ करने की आजादी है लेकिन प्यार करने की नहीं l
इस समाज में बलात्कार करना जुर्म नहीं है लेकिन प्यार करना जुर्म माना जाता है l अगर किसी को प्यार की वजह से जिन्दगी भर की ख़ुशी मिलती है तो इसमें कौनसा जुर्म है l जब दो लोग आजाद पंछी की तरह खुलकर एक-दूजे के साथ जीवन जीना चाहें तो क्या गलत है l क्या प्यार करने वालों को अपनी निजी जिन्दगी जीने का हक़ नहीं है ? जब ये अपना भला-बुरा सोच समझ सकते हैं तो फिर जीवनसाथी चुनने का फैसला भी कर सकते हैं l
इस समाज ने राधा और कृष्ण को तो भगवान बना दिया लेकिन दो युगलों का प्रेम बर्दास्त नहीं है l जब दो व्यस्क आपस में प्यार करते हैं, शादी करना चाहते हैं और अपना जीवन जीना चाहते हैं तो उनके जीवन में बाधा डालने का अधिकार किसी को नहीं है, लेकिन हमारा ये अन्धविश्वासी समाज जाती और धर्म के नाम पर उनके प्यार का दुश्मन बन जाता है, उनकी हत्या करवा देता है या उनको इतना टॉर्चर किया जाता है कि वो खुद अपनी मौत को चुन लेते हैं l ना जाने ये जाती बीच में कहाँ से आ जाती है जो दो प्यार करने वालों के बीच दीवार बन जाती है l यहाँ समाज, जाती और धर्म को ही सब कुछ माना जाता है l क्या जाती और धर्म अपने बच्चों की ख़ुशी से बढ़कर होती है l
क्या हम ऐसे समाज को परिपक्व समाज कह सकते हैं ? हम 21वीं सदी में जी रहे हैं लेकिन हमारा समाज आज भी बार्बरिक युग में जी रहा है l कौन है जो इस जघन्य कृत्य को चुनौती देने की हिम्मत करेगा ? इसका जवाब कानून नहीं है, इसका जवाब हम सभी को अपने आप से पूछना है, इस समाज से पूछना है, जिसके बीच हम रहते है। हमें अपने आप को बदलना होगा, रूढ़िवादिता के चंगुल से स्वयं को और समाज को छुड़ाना होगा, जातिवाद के दलदल से बाहर आकर, ऊँच-नीच के भेद-भाव को ख़त्म करना होगा l अब चुप मत बैठिये समाज को मुंह तोड़ जवाब दें l आप भी समाज की एक कड़ी हैं और आपकी भी जिम्मेदारी बनती है कि ऐसे प्रेमी युगलों की मदद एवं सुरक्षा के लिए आगे आयें ताकि उन्हें अपनी जान ना गवानी पड़े l
ललित दार्शनिक...✍🏻
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